जैसे-जैसे हमारे देश में आन्तरिक विग्रह बढ़ता जा रहा है और लूट-खसोट का बाज़ार अपने उरूज़ पर है, जिसकी सबसे नुमायां मिसालें हैं हाल के कौमनवेल्थ खेल और पिछले कई वर्षों से छत्तीसगढ़, झारखण्ड, आन्ध्र, महाराष्ट्र, उड़ीसा और बंगाल के आदिवासी इलाक़ों में सरकार की मदद से बड़े पूंजीवादी निगमों के दमन और अत्याचार का कसता शिकंजा, जैसे-जैसे हमारे देश में आबादी का एक बड़ा हिस्सा महंगाई, बेरोज़गारी और बुनियादी अधिकारों के छिनने का शिकार हो रहा है. जैसे-जैसे हमारे देश में अमीर इतने अमीर हो गये हैं कि उनकी दौलत साधारण गणित के बाहर चली गयी है और ग़रीब इतने ग़रीब कि वे भी शुमार के परे पहुंच गये हैं. जैसे-जैसे हमारे देश में कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना को परीकथाओं के लोक में धकेल दिया गया है और सरकार ने उन लोगों के प्रति अपनी सारी ज़िम्मेदारियों से हाथ धो लिये हैं, जिनका प्रतिनिधित्व करने का वह दावा करती है. और जैसे-जैसे हमारे देश में स्वर्ग ही की तरह लोकतन्त्र भी इहलोक की जगह परलोक की चीज़ हो गया है जिसके मिलने की सम्भावना शायद मरणोपरान्त ही है, अगर है तो -- वैसे-वैसे कश्मीर का सवाल और अयोध्या के प्रस्तावित राम मन्दिर का प्रश्न -- ये दो मसले और सभी सवालों को पीछे छोड़ कर आगे आ गये हैं और इनके बारे में किसिम-किसिम के बयान और फ़तवे दिये जाने लगे हैं जबकि ये मसले स्थायी और न्यायपूर्ण समाधान की मांग करते हैं.
जहां तक अयोध्या का मसला है, उस पर हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने जो फ़ैसला दिया है, उसने आस्था को आधार बना कर तथ्य और तर्क को परे रखते हुए, होशमन्द-से-होशमन्द आदमी को चकरा दिया है. इस फ़ैसले की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि न्यायाधीश तो जानते ही थे कि इस फ़ैसले को चुनौती दी जायेगी, अब आम लोग भी जानने लगे हैं कि इस फ़ैसले से सवाल सुलझेगा कम, उलझ अलबत्ता और भी जायेगा. खुश हैं तो सिर्फ़ संघ परिवार के लोग जिनकी पिटी हुई नौटंकी को इस फ़ैसले से नयी ज़िन्दगी और नयी मीयाद मिल गयी है. उनके दोनों हाथों में लड्डू हैं. वे बाबरी मस्जिद की विवाद-ग्रस्त ज़मीन के दो-तिहाई हिस्से पर (निर्मोही अखाड़े के साथ) मन्दिर बना सकते हैं, अदालत के बाहर सुन्नी वक्फ़ बोर्ड पर दबाव बना कर उसे मस्जिद बनाने से उपराम कर सकते हैं या उस ज़मीन को मन्दिर हेतु देने के लिए राज़ी करने की कोशिश कर सकते हैं, या फिर सर्वोच्च न्यायालय में जा सकते हैं. इस फ़ैसले के बल पर वे हिन्दुओं में अपनी गिरी हुई पैठ को फिर दुरुस्त करने की कोशिश तो करेंगे ही. सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ज़रूर सांसत में है, क्योंकि उसकी स्थिति दांतों के बीच जीभ जैसी है. जगह का जैसे बंटवारा करने की जुगुत न्यायाधीशों ने बैठायी है, उसके हिसाब से मस्जिद तो बनेगी नहीं और ऐसी कोई भी कोशिश अप्रियता ही पैदा करेगी और उसे छोड़ देना जैसा कि दबाव हिन्दू कट्टरपन्थियों और उदार धर्म-निरपेक्षतावादियों द्वारा डाला जा रहा है, उसे मान लेना अपनी सारी टेक छोड़ देने के बराबर होगा और वह भी किसी लज़्ज़त के बग़ैर और मसले के किसी मुस्तक़िल हल तक पहुंचे बिना. सो, सर्वोच्च न्यायालय जाना ही एकमात्र उपाय बचता है. यों, अब तक के सारे घटनाक्रम के बाद न्यायालय पर कितना भरोसा मुसलमानों को रह गया होगा, यह सोचने की बात है.
रहा सवाल कश्मीर का, तो यह मसला भी अपने ताज़ा दौर में लगभग उतना ही पुराना है जितना अयोध्या का मसला. कश्मीर में क़बाइलियों का हमला 1948 में हुआ था तो बाबरी मस्जिद के सिलसिले में मुक़द्दमा भी 1948 में ही दायर हुआ और अयोध्या में षड्यंत्रपूर्वक रामलला की मूर्ति न्यायालय में विचाराधीन वाद को प्रभावित करने की ख़ातिर 1949 में रखी गयी जिसका हवाला सब-इन्सपेक्टर की रिपोर्ट में है और जिसका संज्ञान तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फ़ैसले में नहीं लिया गया है. सच तो यह है कि ये दोनों ही मसले आधुनिक हिन्दुस्तान की तारीख़ में सीधे-सीधे उस विराट अनर्थकारी घटना के परिणाम हैं जिसे हिन्दुस्तान का बंटवारा कहते हैं.
वैसे तो किसी भी भूभाग में सीमा-निर्धारण कभी अन्तिम नहीं होता. देशों के इतिहास में सत्ता के बदलते समीकरणों के अनुसार भूभाग इधर-उधर होते रहे हैं, होते रहते हैं, 1945 में बांटा गया जर्मनी आज एक है. लेकिन दो राष्ट्रों के सिद्धान्त पर 1947 में हिन्दुस्तान का बंटवारा ऐसा बदक़िस्मती-भरा हादसा है जिसकी मिसाल हमारे इतिहास में सदियों से नहीं मिलती. दो राष्ट्रों के इस नक़ली और जन-विरोधी सिद्धान्त पर देश को बांटने का फ़ैसला जितने ख़ून-ख़राबे और जितनी मानवीय पीड़ा की क़ीमत पर, बांटे जा रहे लोगों की इच्छा-अनिच्छा जाने और उसका ख़याल किये बग़ैर, और आगे भविष्य में विग्रह और वैमनस्य के आधार पैदा करते हुए जिस निर्णायक ढंग से किया गया वह पिछले तीन-चार हज़ार साल के इतिहास में अभूतपूर्व है. इस फ़ैसले को रूप देने वाले तो हिन्दुस्तान की जनता के तईं गुनहगार हैं ही, इसे तस्लीम करने वाले नेता भी उतने ही गुनहगार हैं. ऐसी हालत में यह सवाल उतना सीधा नहीं रह जाता कि कश्मीर (या देश का कोई भी हिस्सा) हिन्दुस्तान का अभिन्न और अखण्ड अंग है या नहीं, था या नहीं, और रहना चाहिए या नहीं और अगर नहीं रहना चाहिए तो फिर उसके अस्तित्व का क्या स्वरूप होना चाहिए.
इसमें कोई शक नहीं है कि हिन्दुस्तान की सरकार ने एक लम्बे समय तक कश्मीर को विशेष दर्जा देते हुए कुछ खास क़िस्म के "पैकेज" देने का बन्दोबस्त किया हुआ है. लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं है कि वहां के आम लोगों के हालात बद-से-बदतर होते चले गये हैं और वहां अरसे से असन्तोष पनपता रहा है जिसका कोई मुकम्मल समाधान नहीं किया गया. इससे भी कोई मुकर नहीं सकता कि एक बहुत लम्बे अरसे से केन्द्रीय सरकार ने कश्मीर में सेना तैनात कर रखी है और "सैन्य बल विशॆष अधिकार क़ानून" वहां लागू कर रखा है. 1989 से अब तक लगभग बीस बरसों में हज़ारों कश्मीरी लोग मार दिये गये हैं या फ़ौजों और अन्य सुरक्षा बलों द्वारा लापता कर दिये गये हैं. ख़ुद भारत सरकार ने माना है कि अब तक 47,000 लोग जानें गंवा बैठे हैं जिनमें फ़ौजियों और सुरक्षाकर्मियों की संख्या 7,000 है और इनमें लापता लोगों की तादाद शामिल नहीं है. अन्य सूत्रों का कहना है कि मारे गये और लापता लोगों की संख्या 1,00,000 से ऊपर है. चूंकि फ़ौजियों और सुरक्षाकर्मियों के बारे में आंकड़े ग़लत नहीं हो सकते, इसलिए हैरत होती है कि वहां किस पैमाने पर और किस क़िस्म की कार्रवाई हो रही है. यह कैसा समाधान है जो लोगों को नेस्त-नाबूद करके किया जा रहा है और क्यों इसे जनसंहार नहीं कहा जाना चाहिए ?
कश्मीर में हिन्दुस्तानी फ़ौज का रिकार्ड बहुत ख़राब रहा है. ऐसा कोई अमानवीय कृत्य नहीं है जो उसने वहां न किया हो -- हत्या से ले कर बलात्कार तक. ज़ाहिर है कि केन्द्रीय सरकार ने ख़ुद प्रकारान्तर से यह मान लिया है कि कश्मीर में उसकी फ़ौज हमलावर फ़ौज की तरह उपस्थित है. यहां तक कि आम हिन्दुस्तानियों को भी महसूस होने लगा है कि तीस से भी अधिक वर्षों तक देश के किसी हिस्से और उसके वासियों को केवल फ़ौज के बल पर क़ाबू में रखना एक तरह से उस हिस्से और उसके वासियों पर युद्ध थोपने के बराबर है. कभी अंग्रेज़ों की तो कभी पकिस्तान की साज़िशों का हवाला दे कर सरकार ने कश्मीर के स्थायी राजनैतिक समाधान को टाले रखा है. शायद ऐसी ही चालें पकिस्तान के जन-विरोधी, अलोकप्रिय हुक्मरान भी अपनी जनता के प्रति अपने वादों को निभा न पाने के कारण असली मुद्दों से ध्यान बंटाने की ख़ातिर करते आ रहे हैं. सच तो यह है कि दोनों देशों की सरकारें अपने बाशिन्दों के तईं समान रूप से गुनहगार हैं और हिन्दुस्तान की सरकार लोकतन्त्र का जितना राग अलापे, लोकतन्त्र और जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने की दृष्टि से उसका रिकार्ड अनन्त दाग़ों और धब्बों से भरा है.
ऐसी हालत में अगर कश्मीरी जनता इस अन्तहीन सैनिक शासन से तंग आ कर आज़ादी की मांग करने लगी है तो इसमें हैरत कैसी ?
अब तक के मानव इतिहास में आत्म-निर्णय का अधिकार देशों का बुनियादी अधिकार होता है. इसी अधिकार के चलते अतीत में किसी मोड़ पर महाराष्ट्र और सौराष्ट्र जैसी राष्ट्रिकताओं ने हिन्दुस्तान में रहने का फ़ैसला किया था. इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि हिन्दुस्तान अनेक राष्ट्रिकताओं, भाषाओं, धर्मों, जातियों, विश्वासों और रहन-सहन की शैलियों का देश है. यह उसकी ख़ासियत है. ऐसी स्थिति में कश्मीर हो या पूर्वोत्तर के प्रान्त, उनमें पनपने वाले असन्तोष का निराकरण फ़ौज के बल पर नहीं किया जा सकता और नहीं किया जाना चाहिए. यहां तक कि पुराने नाम से पुकारूं तो जम्बू द्वीप के किसी भी हिस्से के स्वरूप और उसकी क़िस्मत का फ़ैसला इतिहास की गवाही के आधार पर और राजनैतिक ढंग से, जनता के आत्म-निर्णय के अधिकार को तस्लीम करके ही किया जाना चाहिए. 1947 में हमारे नेताओं ने अंग्रेज़ों के प्रति अपनी ग़ुलामाना ज़ेहनियत के चलते (जो, प्रधान मन्त्री के औक्सफ़ोर्ड भाषण को देखें तो, आज तक बरक़रार है) इस बुनियादी सिद्धान्त को ताक पर धर दिया जिसका ख़मियाज़ा हम आज तक भुगत रहे हैं.
जहां तक कश्मीर के मसले को उलझाने में बाहरी (कथित रूप से पाकिस्तानी) साज़िश वाली मान्यता का सवाल है, एक बुनियादी सत्य यह है कि जब तक आन्तरिक भेद-भाव और विभाजन न हो तब तक कोई बाहरी ताक़त हावी नहीं हो सकती. इसलिए पाकिस्तान को पूरी तरह दोषी ठहराने की बजाय या फिर संघ परिवार और उन जैसे हिंसक मनुष्य-विरोधी कट्टरपन्थियों की चीख़-पुकार के आगे झुकने की बजाय और अपनी ख़ामियों का दोष कभी अंग्रेज़ों के, कभी पाकिस्तान के और कभी अमरीका के मत्थे मढ़्ने से बेहतर होगा कि हम और हमारी सरकार अपने गरेबान में झांके और हर मतभेद को फ़ौजी कार्रवाई द्वारा सुलझाने से गुरेज़ करे. राजनैतिक समस्याओं का राजनैतिक हल ही खोजना और लागू करना चाहिए. ऐसा न करने पर ही यह हुआ है कि आज कश्मीरी जनता आज़ादी की मांग करने लगी है. हिन्दुस्तान से भी और पाकिस्तान से भी क्योंकि जहां तक कश्मीरियों का सवाल है ये दोनों देश एक ही सिक्के के दो पहलू साबित हुए हैं.
अगर हम अन्धे नहीं हैं तो दीवार पर लिखी इबारत साफ़-साफ़ पढ़ी जा सकती है. कश्मीर को कभी "फ़िरदौस बर रुए ज़मीन" कहा गया था -- धरती पर स्वर्ग -- ज़मीन पर जन्नत. ज़रा देखिए कि हमने किस ख़ूबी से उस जन्नत को जहन्नुम में, फ़िरदौस को दोज़ख़ में तब्दील कर दिया है और इस गुनाह में हमारे हाथ भी उतने ही मुब्तिला हैं जितने पकिस्तान के.
जो हम अब भी न चेते तो फिर इस देश को खण्डित होने से हम बचा नहीं पायेंगे और शायद कश्मीर ही वह पहला हिस्सा होगा जो किसी अंग्रेज़ी हुकूमत की साज़िश के कारण नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से हमारे निर्मम, क्रूर, अमानवीय, अन्यायपूर्ण और हिंसक व्यवहार के कारण अलग होगा और कोई भी ताक़त या तर्क इसे रोक नहीं पायेगा.
Monday, October 25, 2010
स्त्रीवाद की आड़ में झूठ की परस्तिश
बात उन दिनों की है जब हिन्दुस्तान बीसवीं सदी की सात दहाइयां पार कर आने के बाद एक नये दौर में क़दम रखने के लिए पर तोल रहा था. आपातकाल को बीते लगभग दस बरस गुज़र चुके थे, हालांकि लोगों के ज़ेहन में उसकी स्मृतियां अभी धूमिल नहीं हुई थीं. इस बीच किसिम-किसिम के सियासी पैंतरे और पैंतरेबाज़ियां और मुनासिब-ग़ैर-मुनासिब गंठजोड़ देखने को मिले थे, मगर बिल-आख़िर कांग्रेस पार्टी गद्दी पर वापस आने में कामयाब हो गयी थी. एशियाई खेल सम्पन्न हो चुके थे. रंगीन टीवी और नित-नये खुलते प्रसारण-मीनारों ने मनोरंजन ही नहीं, सूचना-संचार के अब तक अनदेखे क्षितिज खोल दिये थे, गो आगे कुछ वक़्त बीतते ही निजीकरण की बयार के चलते ही उसकी जो बहार नज़र आने वाली थी, वह अभी मौसम की छुअन का इन्तज़ार करती कलियों की तरह अर्द्ध-निमीलित अवस्था में थी. श्रीमती गान्धी का करिश्मा -- जिसने उन्हें १९४७ के बाद के हिन्दुस्तान का अब तक का सबसे ताक़तवर नेता बना दिया था -- धीरे-धीरे अपना असर खो कर उन्हें कुछ ऐसी ग़लतियां करने पर मजबूर कर चुका था जो अन्तत: उनकी हत्या का सबब बन गयीं. चूंकि उनके पुत्र एवं राजनैतिक उत्तराधिकारी संजय गान्धी १९८१ में ही अकाल कवलित हो चुके थे, चुनांचे श्रीमती गान्धी के बड़े पुत्र राजीव गान्धी को विमान चलानें की हिकमतों से काम लेते हुए, देश चलाने की ज़िम्मेदारी को प्रकट अनिच्छा से अपने कन्धों पर लेने के लिए "विवश" होना पड़ा और उन्होंने इस फ़ैसले से भारतीय राजनीति में वंशवाद की अंकुआती हुई परम्परा पर आधिकारिक मुहर लगा दी और १९८४ के बाद की राजनैतिक प्रवृत्तियों में इस अंकुए को एक अच्छा-ख़ासा पेड़ बनने में मदद दी. कांग्रेस के भीतर उसके टूटते हुए आधार को ले कर काफ़ी उथल-पुथल हो ही रही थी. आपातकाल की नाकामियों की एक वजह हमारी अर्थ-व्यवस्था में अविचारित राष्ट्रीयकरण से उपजी मन्दी थी, दूसरी ओर बड़े पूंजीवादी घरानों के भीतर कल्याणकारी राज्य के प्रति असन्तोष था. इसी के साथ-साथ धर्म और साम्प्रदायिकता के दबाव ने कांग्रेस को अब तक न टटोले गये कुछ उपाय आज़माने के लिए प्रेरित करना भी शुरू कर दिया था. तेज़ नज़र वालों से यह बात न छुपी रही होगी कि श्रीमती गान्धी की अन्त्येष्टि के समय राजीव गान्धी ने ज़रूरत से ज़्यादा मोटा यज्ञोपवीत पहन रखा था -- इतना कि कैमरे के लौंग शौट में भी नज़र आ जाये. इसलिए उन्हें इस बात से भी हैरत नहीं हुई कि सत्ता संभालते ही एक ओर तो राजीव गान्धी ने उदारीकरण, निजीकरण और नयी आर्थिक नीतियों के तहत विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए धड़ाधड़ दरवाज़े खोलने शुरू कर दिये और यह सोचे बग़ैर कि देश की अपार श्रम-शक्ति को कैसे रोज़गार मुहैया कराया जाये, कम्प्यूटरीकरण और नयी, आधुनिक तकनीकों को अमल में लाने के लिए क़दम उठाने शुरू कर दिये; दूसरी ओर "जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है" जैसा नायाब सूत्र देते हुए सिक्खों का क़त्ले-आम कराने और उन्हें सबक़ सिखाने के बाद बाबरी मस्जिद का ताला खुलवा कर दो राष्ट्रों के सिद्धान्त पर १९४७ में हुए देश के बंटवारे के बाद हिन्दुस्तान के इतिहास के सबसे बड़े साम्प्रदायिक विग्रह की बुनियाद रख दी. कहने की बात नहीं है कि इन सारी बदली हुई या कहें कि तेज़ी से बदलती हुई परिस्थितियों का फ़ौरी असर मीडिया पर देखने को मिला, क्योंकि वही एक तरह से घटनाओं का सब से पहला गवाह होता है. मैं ने ऊपर मनोरंजन और सूचना-संचार के आसन्न परिवर्तनों का ज़िक्र किया है. इन परिवर्तनों की एक बेहद छोटी-सी झलक मुझे इन्हीं दिनों ग़ालिबन १९८६-८७ में देखने को मिली जिन से मुझे हल्का-सा अन्दाज़ा हुआ कि इस क्षेत्र में चल रही बयार कैसी आंधी की शक्ल लेने वाली है.
उन दिनों "जनसत्ता" और "नव भारत टाइम्ज़" के दफ़्तर दिल्ली के बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पर अगल-बग़ल हुआ करते थे. मेरे मित्र मंगलेश डबराल "जनसत्ता" में थे और इब्बार रब्बी और विष्णु नागर "नव भारत टाइम्ज़" में. इन सभी से मिलने के लिए मैं इन दोनों अख़बारों के दफ़्तरों में जाया करता था. जनसत्ता के साथ उन दिनों कुछ अधिक जुडाव था. मंगलेश ने ही अपने अमृत प्रभात के दिनों में जब वह इलाहाबाद में था मुझको और अन्य लोगों को अख़बार में लिखने की तरफ़ खींचा था और अब "जनसत्ता" में भी वह उसी रवैये पर क़ायम था. भोपाल गैस काण्ड के बाद "जनसत्ता" प्रतिरोध का एक गढ़-सा बना हुआ था और उसके व्यवस्था-विरोधी रवैये की वजह से भी हम लोग वहां ज़्यादा जाते थे. सिक्खों के नरसंहार के बाद "जनसत्ताव के पत्रकारों ने कुछ बेहतरीन समाचार और विश्लेषण प्रकाशित किये थे. "जनसत्ता" के एक युवा पत्रकार ने बड़ी निर्भीकता से इस नरसंहार की हिला देने वाली ख़बरें फ़ाइल की थीं. यही नहीं उसने शराब माफ़िया के एक बड़े सेठ द्वारा छ्त्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के अप्रतिम योद्धा शंकर गुहा नियोगी की हत्या की घटना पर भी ऐसी साहसी और विचारोत्तेजक रिपोर्टिंग की थी जिसे आन्दोलनकारी कहा जा सकता था.
तभी मुझे दूरदर्शन के लिए बनाये जा रहे एक डाक्युमेण्टरी धारावाहिक के आलेख तैयार करने और अपनी आवाज़ में उन्हें रिकार्ड कराने के लिए कुछ समय के लिए अन्यत्र व्यस्त हो जाना पड़ा और "जनसत्ता" के दफ़्तर जाना थोड़ा अनियमित हो गया. कुछ दिन बाद जब मैं वहां गया तो एक चर्चा वहां आम थी कि उस तेज़-तर्रार युवा पत्रकार को चन्द्रा स्वामी ने एक क़ीमती पुखराज की अंगूठी दी है. मुझे एकबारगी विश्वास नहीं हुआ. लोगों ने कहा कि विश्वास न हो तो पूछ लीजिए, आखिर आपका अज़ीज़ है. मैंने उस युवा पत्रकार को तलाश किया और छूटते ही उससे पूछा कि भई, तुम्हारे बारे में जो यह कहा जा रहा है वह क्या सच है. उसने कहा हां, चन्द्रा स्वामी से मैं खबरों के सिलसिले में मिलने जाता था, उन्होंने यह पुखराज की अंगूठी दी है. और उसने अपने हाथ में पहनी अंगूठी मुझे दिखायी. यह भी बताया कि पुखराज दस कैरेट का है. मुझे याद है पुख्रराज बहुत उम्दा था, उस अंगूठी की दोनों तरफ़ दो-दो या शायद तीन-तीन हीरे जड़े थे और वह ख़ासी भारी थी. चन्द्रा स्वामी तब तक अपनी बदनामी की राह पर क़दम रख चुके थे और हथियारों के सौदागर ख़ाशोग्गी से उनके सम्बन्धों की चर्चा आम थी. अपने उस प्रिय युवा पत्रकार के चेहरे पर किसी क़िस्म की शर्मिन्दगी या अस्वस्ति का भाव न पा कर मैं एक आहत ख़ामोशी में डूब गया था.
दूसरी घटना भी इसके कुछ ही समय बाद की है. और इसका सम्बन्ध "जनसत्ता" के तत्कालीन सम्पादक प्रभाष जोशी से है. प्रभाष जी -- राजेन्द्र माथुर और राहुल बारपुते के साथ-साथ -- "नयी दुनिया, इन्दौर" के उन पत्रकारों में से थे जिन्होंने हिन्दी पत्रकारिता में एक नयी लहर पैदा की थी. "नयी दुनिया" से हम सब का परिचय इसलिए भी था कि शरद जोशी उसमें नियमित रूप से लिखते रहे थे, चुनांचे राजेन्द्र जी और प्रभाष जी से भी हो गया. फिर राजेन्द्र माथुर "नयी दुनिया" से "नव भारत टाइम्ज़" में आ गये और प्रभाष जी ने "आस-पास" निकालने के बाद "जनसत्ता" निकाला और जब मैं १९८४ के आरम्भ में वापस हिन्दुस्तान आया तो "जनसत्ता" को निकलते १३ महीने हो चुके थे और उसका सर्कुलेशन १,७५००० हो चुका था जैसा कि मंगलेश ने मुझे बताया था. यों,
"नयी दुनिया" और उसके पत्रकारों की तेवर भरी पत्रकारिता से चमत्कृत होते हुए भी हम दिल में यही महसूस करते थे कि उन सब का रुझान कुछ-कुछ दक्षिणपन्थी है. यह बात आगे चल कर साबित भी हुई जब दिवराला के सती-प्रसंग में प्रभाष जी ने सती-प्रथा के समर्थन में "जनसत्ता" मे लिखे बनवारी के बेहद दक़ियानूसी लेखों की ताईद ही नहीं की, बल्कि अपनी ओर से बनवारी के रुख़ और रवैये का समर्थन भी किया और वह भी आंख के सील के सूखने की परवाह किये बग़ैर. (यही प्रभाष जोशी थे जिन्होंने अपने आखिरी दिनों में मेधा को चितपावन ब्राह्मणों से जोड़ते हुए सचिन तेण्डुलकर के पराक्रम का असली उत्स चिह्नित किया था.)
बहरहाल, सती-प्रसंग वह पहला प्रकरण था जिससे प्रभाष जी के रूढ़िवादी गुण उजागर हुए थे. उस प्रकरण के सिलसिले में इतना और कि तब तक उनकी और उनके अख़बार की छवि वामपन्थी न होते हुए भी किसी हद तक आन्दोलनकारी कही जा सकती थी और उसमें सनसनी और चटपटेपन, दुष्टता और कुटिल वाम-विरोध का वह पुट नहीं था जो बाद के वर्षों में बढ़ता और नुमायां होता चला गया. और जिसके अलमबरदार मृणाल वल्लरी और उन जैसे दसियों दूसरे पत्रकार हैं, जो मुखर -- या कहा जाये बड़बोली, कथित रूप से समाज-सुधारक, लेकिन वास्तव में सनसनीख़ेज़ और कटखनेपन तक आक्रामक -- पत्रकारिता के हामी हैं.
प्रभाष जी हों या बनवारी, उनमें इतनी विशेषता तो थी कि जो वे लिखते थे वह उनकी अपनी सोच होती थी. वे किसी के इशारे पर या अंग्रेज़ी अख़बारों से उठा कर न तो कोई ख़बर छापते थे, न व्याख्या-विवेचन ही करते थे. दिवराला वाले काण्ड में भी झगड़ा तथ्यों को ले कर उतना नहीं था जितना उस घटना को देखने के नज़रिये का था. रूपकुंवर का परिवार औसत मध्यवर्गीय राजपूत परिवार था, दक़ियानूसी और पश्चगामी. और रूपकुंवर द्वारा पति के साथ सती हो जाने की घोषणा एक सद्य:-विधवा युवती के शोक पीड़ित चित्त की सहज विक्षिप्तता की उद्भावना थी, उसके पीछे सदियों से गहरे पैठे कुसंस्कारों और रूढ़िवादी सोच का हाथ था. इसलिए ऐसा नहीं था कि रूपकुंवर को किसी बड़ी सम्पत्ति के अधिकार से वंचित करने के लिए उसे सती होने दिया गया, जैसा कि कई मामलों मे देखा गया था. लेकिन जैसा कि मुझसे इण्टरव्यू में मारग्रेट अल्वा ने कहा था, सवाल और बुनियादी था; श्रीमती अल्वा ने कहा था कि आप कनाट प्लेस में एक व्यक्ति की हत्या कर देंगे और उसे हत्या कहेंगे और एक औरत को उसके पति की चिता पर ज़िन्दा जल जाने देंगे और सती के तौर पर उसका गुणगान करेंगे, यह कैसा तर्क हुआ.
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मैं तब तक श्रीमती अल्वा का विरोधी ही था, क्योंकि मैं उन्हें राजीव गान्धी के किचन-कैबिनेट ही का सदस्य समझता था. लेकिन उनकी इस बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया था. अपने अन्तर्निहित सत्य के कारण भी और इसलिए भी कि उस समय राजस्थान में हरिदेव जोशी की कांग्रेसी सरकार थी और उस पर वहां के राजपूत धड़ों का बेपनाह दबाव था और बड़े-बड़े सामन्तों की अगुवाई में राजपूत जयपुर की सड़कों पर जुलूस निकाल रहे थे, और राजस्थान सर्कार निष्क्रिय बनी हुई थी. तो भी श्रीमती अल्वा ने अपनी पार्टी की सरकार के बचाव में हरिदेव जोशी के रुख़ की लीपा-पोती करने की बजाय दूरदर्शन पर, जो तब तक पूरी तरह सरकारी माध्यम था, खुली-खरी कहने का -- साहस, नहीं यह शब्द सरासर ग़लत होगा -- उत्तरदायित्व निभाया था.
बहरहाल, ये पुराने प्रसंग मुझे उन तब्दीलियों के सिलसिले में याद आये जो उन पुराने पत्रकारों की तुलना में आज के पत्रकारों में नज़र आती हैं, जब मीडिया धीरे-धीरे अपनी सारी, या कहा जाये लगभग सारी, विश्वसनीयता खोता चला गया है. अब यही देखिए कि मृणाल वल्लरी जैसी पत्रकार हैं जो अत्यन्त निर्लज्जता से पत्रकारिता के सारे उसूलों को ताक़ पर धर कर सरकार के माओवाद-विरोधी अभियान और दुरभिसन्धि में शामिल हैं. अपने महान अख़बार "जनसत्ता" में ९ सितम्बर २०१० को "लाल क्रान्ति के सपने की कालिमा" शीर्षक से छपे लेख में वे अगस्त में अंग्रेज़ी अख़बार में छपी ख़बर की जूठन को बड़े तम-तराक से पेश करके गृह मन्त्री चिदम्बरम की घृणित साज़िश में शिरकत करती हैं और जब उनसे सवाल पूछे जाते हैं तो उनका जवाब देने की बजाय पलट कर हमला करते हुए अपने विरोधिय़ों पर स्त्री-विरोधी होने का आरोप लगाती हैं. यही नहीं अपने जुझारू स्त्रीवादी होने को साबित करने के लिए वे सात साल पुराना एक लेख फिर से छपवाती हैं जिसका कोई सम्बन्ध उनके पिछले लेख से नहीं है.
अगले अंक में कल अगला हिस्सा पढ़ें -- "झूठ के पुलिन्दों पर बैठा स्त्री-विमर्श"
उन दिनों "जनसत्ता" और "नव भारत टाइम्ज़" के दफ़्तर दिल्ली के बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पर अगल-बग़ल हुआ करते थे. मेरे मित्र मंगलेश डबराल "जनसत्ता" में थे और इब्बार रब्बी और विष्णु नागर "नव भारत टाइम्ज़" में. इन सभी से मिलने के लिए मैं इन दोनों अख़बारों के दफ़्तरों में जाया करता था. जनसत्ता के साथ उन दिनों कुछ अधिक जुडाव था. मंगलेश ने ही अपने अमृत प्रभात के दिनों में जब वह इलाहाबाद में था मुझको और अन्य लोगों को अख़बार में लिखने की तरफ़ खींचा था और अब "जनसत्ता" में भी वह उसी रवैये पर क़ायम था. भोपाल गैस काण्ड के बाद "जनसत्ता" प्रतिरोध का एक गढ़-सा बना हुआ था और उसके व्यवस्था-विरोधी रवैये की वजह से भी हम लोग वहां ज़्यादा जाते थे. सिक्खों के नरसंहार के बाद "जनसत्ताव के पत्रकारों ने कुछ बेहतरीन समाचार और विश्लेषण प्रकाशित किये थे. "जनसत्ता" के एक युवा पत्रकार ने बड़ी निर्भीकता से इस नरसंहार की हिला देने वाली ख़बरें फ़ाइल की थीं. यही नहीं उसने शराब माफ़िया के एक बड़े सेठ द्वारा छ्त्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के अप्रतिम योद्धा शंकर गुहा नियोगी की हत्या की घटना पर भी ऐसी साहसी और विचारोत्तेजक रिपोर्टिंग की थी जिसे आन्दोलनकारी कहा जा सकता था.
तभी मुझे दूरदर्शन के लिए बनाये जा रहे एक डाक्युमेण्टरी धारावाहिक के आलेख तैयार करने और अपनी आवाज़ में उन्हें रिकार्ड कराने के लिए कुछ समय के लिए अन्यत्र व्यस्त हो जाना पड़ा और "जनसत्ता" के दफ़्तर जाना थोड़ा अनियमित हो गया. कुछ दिन बाद जब मैं वहां गया तो एक चर्चा वहां आम थी कि उस तेज़-तर्रार युवा पत्रकार को चन्द्रा स्वामी ने एक क़ीमती पुखराज की अंगूठी दी है. मुझे एकबारगी विश्वास नहीं हुआ. लोगों ने कहा कि विश्वास न हो तो पूछ लीजिए, आखिर आपका अज़ीज़ है. मैंने उस युवा पत्रकार को तलाश किया और छूटते ही उससे पूछा कि भई, तुम्हारे बारे में जो यह कहा जा रहा है वह क्या सच है. उसने कहा हां, चन्द्रा स्वामी से मैं खबरों के सिलसिले में मिलने जाता था, उन्होंने यह पुखराज की अंगूठी दी है. और उसने अपने हाथ में पहनी अंगूठी मुझे दिखायी. यह भी बताया कि पुखराज दस कैरेट का है. मुझे याद है पुख्रराज बहुत उम्दा था, उस अंगूठी की दोनों तरफ़ दो-दो या शायद तीन-तीन हीरे जड़े थे और वह ख़ासी भारी थी. चन्द्रा स्वामी तब तक अपनी बदनामी की राह पर क़दम रख चुके थे और हथियारों के सौदागर ख़ाशोग्गी से उनके सम्बन्धों की चर्चा आम थी. अपने उस प्रिय युवा पत्रकार के चेहरे पर किसी क़िस्म की शर्मिन्दगी या अस्वस्ति का भाव न पा कर मैं एक आहत ख़ामोशी में डूब गया था.
दूसरी घटना भी इसके कुछ ही समय बाद की है. और इसका सम्बन्ध "जनसत्ता" के तत्कालीन सम्पादक प्रभाष जोशी से है. प्रभाष जी -- राजेन्द्र माथुर और राहुल बारपुते के साथ-साथ -- "नयी दुनिया, इन्दौर" के उन पत्रकारों में से थे जिन्होंने हिन्दी पत्रकारिता में एक नयी लहर पैदा की थी. "नयी दुनिया" से हम सब का परिचय इसलिए भी था कि शरद जोशी उसमें नियमित रूप से लिखते रहे थे, चुनांचे राजेन्द्र जी और प्रभाष जी से भी हो गया. फिर राजेन्द्र माथुर "नयी दुनिया" से "नव भारत टाइम्ज़" में आ गये और प्रभाष जी ने "आस-पास" निकालने के बाद "जनसत्ता" निकाला और जब मैं १९८४ के आरम्भ में वापस हिन्दुस्तान आया तो "जनसत्ता" को निकलते १३ महीने हो चुके थे और उसका सर्कुलेशन १,७५००० हो चुका था जैसा कि मंगलेश ने मुझे बताया था. यों,
"नयी दुनिया" और उसके पत्रकारों की तेवर भरी पत्रकारिता से चमत्कृत होते हुए भी हम दिल में यही महसूस करते थे कि उन सब का रुझान कुछ-कुछ दक्षिणपन्थी है. यह बात आगे चल कर साबित भी हुई जब दिवराला के सती-प्रसंग में प्रभाष जी ने सती-प्रथा के समर्थन में "जनसत्ता" मे लिखे बनवारी के बेहद दक़ियानूसी लेखों की ताईद ही नहीं की, बल्कि अपनी ओर से बनवारी के रुख़ और रवैये का समर्थन भी किया और वह भी आंख के सील के सूखने की परवाह किये बग़ैर. (यही प्रभाष जोशी थे जिन्होंने अपने आखिरी दिनों में मेधा को चितपावन ब्राह्मणों से जोड़ते हुए सचिन तेण्डुलकर के पराक्रम का असली उत्स चिह्नित किया था.)
बहरहाल, सती-प्रसंग वह पहला प्रकरण था जिससे प्रभाष जी के रूढ़िवादी गुण उजागर हुए थे. उस प्रकरण के सिलसिले में इतना और कि तब तक उनकी और उनके अख़बार की छवि वामपन्थी न होते हुए भी किसी हद तक आन्दोलनकारी कही जा सकती थी और उसमें सनसनी और चटपटेपन, दुष्टता और कुटिल वाम-विरोध का वह पुट नहीं था जो बाद के वर्षों में बढ़ता और नुमायां होता चला गया. और जिसके अलमबरदार मृणाल वल्लरी और उन जैसे दसियों दूसरे पत्रकार हैं, जो मुखर -- या कहा जाये बड़बोली, कथित रूप से समाज-सुधारक, लेकिन वास्तव में सनसनीख़ेज़ और कटखनेपन तक आक्रामक -- पत्रकारिता के हामी हैं.
प्रभाष जी हों या बनवारी, उनमें इतनी विशेषता तो थी कि जो वे लिखते थे वह उनकी अपनी सोच होती थी. वे किसी के इशारे पर या अंग्रेज़ी अख़बारों से उठा कर न तो कोई ख़बर छापते थे, न व्याख्या-विवेचन ही करते थे. दिवराला वाले काण्ड में भी झगड़ा तथ्यों को ले कर उतना नहीं था जितना उस घटना को देखने के नज़रिये का था. रूपकुंवर का परिवार औसत मध्यवर्गीय राजपूत परिवार था, दक़ियानूसी और पश्चगामी. और रूपकुंवर द्वारा पति के साथ सती हो जाने की घोषणा एक सद्य:-विधवा युवती के शोक पीड़ित चित्त की सहज विक्षिप्तता की उद्भावना थी, उसके पीछे सदियों से गहरे पैठे कुसंस्कारों और रूढ़िवादी सोच का हाथ था. इसलिए ऐसा नहीं था कि रूपकुंवर को किसी बड़ी सम्पत्ति के अधिकार से वंचित करने के लिए उसे सती होने दिया गया, जैसा कि कई मामलों मे देखा गया था. लेकिन जैसा कि मुझसे इण्टरव्यू में मारग्रेट अल्वा ने कहा था, सवाल और बुनियादी था; श्रीमती अल्वा ने कहा था कि आप कनाट प्लेस में एक व्यक्ति की हत्या कर देंगे और उसे हत्या कहेंगे और एक औरत को उसके पति की चिता पर ज़िन्दा जल जाने देंगे और सती के तौर पर उसका गुणगान करेंगे, यह कैसा तर्क हुआ.
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मैं तब तक श्रीमती अल्वा का विरोधी ही था, क्योंकि मैं उन्हें राजीव गान्धी के किचन-कैबिनेट ही का सदस्य समझता था. लेकिन उनकी इस बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया था. अपने अन्तर्निहित सत्य के कारण भी और इसलिए भी कि उस समय राजस्थान में हरिदेव जोशी की कांग्रेसी सरकार थी और उस पर वहां के राजपूत धड़ों का बेपनाह दबाव था और बड़े-बड़े सामन्तों की अगुवाई में राजपूत जयपुर की सड़कों पर जुलूस निकाल रहे थे, और राजस्थान सर्कार निष्क्रिय बनी हुई थी. तो भी श्रीमती अल्वा ने अपनी पार्टी की सरकार के बचाव में हरिदेव जोशी के रुख़ की लीपा-पोती करने की बजाय दूरदर्शन पर, जो तब तक पूरी तरह सरकारी माध्यम था, खुली-खरी कहने का -- साहस, नहीं यह शब्द सरासर ग़लत होगा -- उत्तरदायित्व निभाया था.
बहरहाल, ये पुराने प्रसंग मुझे उन तब्दीलियों के सिलसिले में याद आये जो उन पुराने पत्रकारों की तुलना में आज के पत्रकारों में नज़र आती हैं, जब मीडिया धीरे-धीरे अपनी सारी, या कहा जाये लगभग सारी, विश्वसनीयता खोता चला गया है. अब यही देखिए कि मृणाल वल्लरी जैसी पत्रकार हैं जो अत्यन्त निर्लज्जता से पत्रकारिता के सारे उसूलों को ताक़ पर धर कर सरकार के माओवाद-विरोधी अभियान और दुरभिसन्धि में शामिल हैं. अपने महान अख़बार "जनसत्ता" में ९ सितम्बर २०१० को "लाल क्रान्ति के सपने की कालिमा" शीर्षक से छपे लेख में वे अगस्त में अंग्रेज़ी अख़बार में छपी ख़बर की जूठन को बड़े तम-तराक से पेश करके गृह मन्त्री चिदम्बरम की घृणित साज़िश में शिरकत करती हैं और जब उनसे सवाल पूछे जाते हैं तो उनका जवाब देने की बजाय पलट कर हमला करते हुए अपने विरोधिय़ों पर स्त्री-विरोधी होने का आरोप लगाती हैं. यही नहीं अपने जुझारू स्त्रीवादी होने को साबित करने के लिए वे सात साल पुराना एक लेख फिर से छपवाती हैं जिसका कोई सम्बन्ध उनके पिछले लेख से नहीं है.
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Wednesday, October 6, 2010
राग अयोध्या
राग अयोध्या
मन्दिर वहीं बना
(ताल भाजपा)
जजपा जजपा जजपा
ज ज ज ज ज ज ज ज
पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा भा भा भा भा
भाजपा भाजपा भाजपा पा पा पा
मन्दिर वहीं बना बना बना बना
पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा
जपा जपा जपा भाजपा भाजपा भाजपा
मुसलमान को मार भगा तू
मस्जिद तोड़ गिरा गिरा गिरा गिरा तू
मन्दिर वहीं बना बना बना बना
अब मन्दिर वहीं बना
भाभाजजपापा पाभाज पाजपा भाभाभा पाजभा जपाभा
पाभाज पाजपा भाभाभा पाजभा जपाभा
अटल प्रेम जतला ला ला ला ला
राम लला को बेच-बेच तू अडवानी गुन गा गा गा गा गा
आ आ आ आ पाभापा पाजपा भाभाभा पाजभा जपाभा
भाभाजजपापा भाजपा भाजपा भाजपा
मन्दिर वहीं बना
मरें भूख से भारतवासी
मरें किसान लगा कर फांसी
सीता माता रहे उदासी
रामशिला को ला ला तू राजनीति चमका, चमका, चमका तू
मन्दिर वहीं बना
भाभाभा जजज पापापा भाजपा भाजपा भाजपा भाजपा
सन्त-महन्त मुटाते जायें, राम नाम को बेचें-खायें
इनकी हाट सजा सजा सजा सजा तू
मन्दिर वहीं बना
भाजपा
भाजपा भाजपा भाजपा
हिन्दू वोट बटोर, खोल कर ताला
रामलला बैठा, बैठा बैठा, बैठा तू
मस्जिद को गिरवा गिरवा गिरवा गिरवा तू
मन्दिर वहीं बना
पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा
जपा जपा जपा जजपा
मोदी तेरा हनूमान है नितिन गडकरी अंगद
बालठाकरे बना जटायु सुषमा है त्रिजटा
त्रिजटा त्रिजटा त्रिजटा
तू मन्दिर वहीं बना
पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा
जपा जपा जपा जजपा
देस लूट कर घर को भर ले, पूंजी को मुट्ठी में कर ले
बैठ गोद में अमरीका की, मनमोहन कहला
कहला कहला कहला तू चिदम्बरम को ला ला ला तू
मन्दिर वहीं बना
जपा जपा जपा जजपा
पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा
चाहे तू भगवा लहराये, या पंजे पर मुहर लगाये
रामराज में सब चलता है रामराज को ला, ला ला ला तू
मन्दिर वहीं बना बना बना बना
जजपा जजपा जजपा
ज ज ज ज ज ज ज ज
पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा भा भा भा भा
भाजपा भाजपा भाजपा पा पा पा
मन्दिर वहीं बना बना बना बना
मन्दिर वहीं बना
(ताल भाजपा)
जजपा जजपा जजपा
ज ज ज ज ज ज ज ज
पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा भा भा भा भा
भाजपा भाजपा भाजपा पा पा पा
मन्दिर वहीं बना बना बना बना
पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा
जपा जपा जपा भाजपा भाजपा भाजपा
मुसलमान को मार भगा तू
मस्जिद तोड़ गिरा गिरा गिरा गिरा तू
मन्दिर वहीं बना बना बना बना
अब मन्दिर वहीं बना
भाभाजजपापा पाभाज पाजपा भाभाभा पाजभा जपाभा
पाभाज पाजपा भाभाभा पाजभा जपाभा
अटल प्रेम जतला ला ला ला ला
राम लला को बेच-बेच तू अडवानी गुन गा गा गा गा गा
आ आ आ आ पाभापा पाजपा भाभाभा पाजभा जपाभा
भाभाजजपापा भाजपा भाजपा भाजपा
मन्दिर वहीं बना
मरें भूख से भारतवासी
मरें किसान लगा कर फांसी
सीता माता रहे उदासी
रामशिला को ला ला तू राजनीति चमका, चमका, चमका तू
मन्दिर वहीं बना
भाभाभा जजज पापापा भाजपा भाजपा भाजपा भाजपा
सन्त-महन्त मुटाते जायें, राम नाम को बेचें-खायें
इनकी हाट सजा सजा सजा सजा तू
मन्दिर वहीं बना
भाजपा
भाजपा भाजपा भाजपा
हिन्दू वोट बटोर, खोल कर ताला
रामलला बैठा, बैठा बैठा, बैठा तू
मस्जिद को गिरवा गिरवा गिरवा गिरवा तू
मन्दिर वहीं बना
पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा
जपा जपा जपा जजपा
मोदी तेरा हनूमान है नितिन गडकरी अंगद
बालठाकरे बना जटायु सुषमा है त्रिजटा
त्रिजटा त्रिजटा त्रिजटा
तू मन्दिर वहीं बना
पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा
जपा जपा जपा जजपा
देस लूट कर घर को भर ले, पूंजी को मुट्ठी में कर ले
बैठ गोद में अमरीका की, मनमोहन कहला
कहला कहला कहला तू चिदम्बरम को ला ला ला तू
मन्दिर वहीं बना
जपा जपा जपा जजपा
पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा
चाहे तू भगवा लहराये, या पंजे पर मुहर लगाये
रामराज में सब चलता है रामराज को ला, ला ला ला तू
मन्दिर वहीं बना बना बना बना
जजपा जजपा जजपा
ज ज ज ज ज ज ज ज
पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा भा भा भा भा
भाजपा भाजपा भाजपा पा पा पा
मन्दिर वहीं बना बना बना बना
Monday, October 4, 2010
रिसती हुई क्रान्ति
छ्ठी किस्त
क्या माओवादी भारत के सम्विधान की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं ?
अब जबकि खनन के लाइसेंस ऐसी त्वरा से जारी कर दिये गये हैं जिसे आप घबराहट में कौड़ियों के दाम की जा रही बिक्री से जोड़ कर देखते आये हैं, और जो घोटाले उभर कर सामने आ रहे हैं वे करोड़ों डालरों में कूते गये हैं, अब जबकि खनन कम्पनियों ने नदियों को प्रदूषित कर दिया है, प्रान्तों की सरहदों को खनन से खोखला बना दिया है, पर्यावरण की ऐसी-तैसी कर दी है और गृह-युद्ध छिड़वा दिया है, चुड़ैल-सभा की लगायी हुई आग के नतीजे सामने आने लगे हैं -- और हाय-तौबा भी -- तहस-नहस इलाक़े और ग़रीबों के शवों पर पढ़े जा रहे किसी पौराणिक फ़ातिहे की तरह.
ज़रा उस खेद पर ध्यान दीजिए जिससे मन्त्री महोदय अपने व्याख्यान में लोकतन्त्र और उससे जुड़ी ज़िम्मेदारियों की बात करते हैं : "लोकतन्त्र -- या कहा जाये कि लोकतान्त्रिक संस्थाओं और समाजवादी युग की विरासत -- ने वास्तव में विकास की चुनौतियां बढ़ा दी हैं." इसके बाद वे मुआवज़ों, पुनर्वास और रोज़गार के मुद्दों से सम्बन्धित उन्हीं पिटे-पिटाये झूठों की झड़ी लगा देते हैं.
कैसा मुआवज़ा ? कैसी क्षतिपूर्ति ? कैसा पुनर्वास ? और कौन-सी "हर परिवार के लिए एक नौकरी ?" (हिन्दुस्तान में साठ साल के औद्योगीकरण ने सिर्फ़ मज़दूरों की कुल संख्या की ६ फ़ीसदी के लिए रोज़गार का बन्दोबस्त किया है. रही बात भूमि के "अनिवार्य अधिग्रहण" का "औचित्य" साबित करने की "बन्दिश" की तो एक मन्त्री निश्चित रूप से जानता है कि आदिवासियों की भूमि ( जहां सबसे अधिक खनिजों की भारी मात्रा है) का अनिवार्यत: अधिग्रहण करना और उसे निजी खनन कम्पनियों के हवाले कर देना "पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित) अधिनियम" के अन्तर्गत ग़ैर-क़ानूनी और असंवैधानिक है. १९९६ में पारित पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित) अधिनियम एक संशोधन है जिसके माध्यम से आदिवासियों के साथ की गयी कुछ नाइन्साफ़ियों को दुरुस्त करने की कोशिश की गयी है जो १९५० में संसद द्वारा स्वीकृत भारतीय सम्विधान में निहित थीं. वह ऐसे सभी क़ानूनों को निरस्त कर देता है जो उसके प्रावधानों के विरुद्ध जा सकते हैं. यह क़ानून स्वीकार करता है कि आदिवासी समुदाय उत्तरोत्तर बढ़ती हुई मात्रा में हाशिये पर चले गये हैं और इस का उद्देश्य इस शक्ति-सन्तुलन को क्रान्तिकारी ढंग से बराबरी की तरफ़ संशोधित करने का है. क़ानून के एक नमूने की हैसियत से यह अनोखा है, क्योंकि यह समूह -- समुदाय -- को एक क़ानूनी हैसियत प्रदान करता है और यह अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों को स्व-शासन का अधिकार देता है. पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित) अधिनियम, १९९६ के अन्तर्गत आदिवासी भूमि के "अनिवार्य अधिग्रहण" को किसी भी दलील से सही नहीं ठहराया जा सकता. लिहाज़ा, यह विडम्बना ही है कि जिन लोगों को "माओवादी" कहा जा रहा है (जिनमें वे सभी शामिल हैं जो भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं) दरअसल सम्विधान की रक्षा करने के लिए ही लड़ रहे हैं, जबकि सरकार उसका उल्लंघन और तिरस्कार करने की भरसक कोशिश कर रही है.
२००८ और २००९ के बीच पंचायती राज मन्त्रालय ने दो शोधार्थियों को देश में पंचायती राज की प्रगति के बारे में तैयार की जा रही एक रिपोर्ट के लिए एक अध्याय लिखने का काम सौंपा. अध्याय का शीर्षक है "पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित) क़ानून, १९९६, वामपन्थी अतिवाद और शासन : भारत के आदिवासी इलाक़ों में चिन्ताएं और चुनौतियां" और इसके लेखक हैं अजय दाण्डेकर और चित्रांगदा चौधरी. इसके कुछ उद्धरण नीचे दिये जा रहे हैं :
"१८९४ का केन्द्रीय भूमि अधिग्रहण अधिनियम आज तक ’पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित) क़ानून, १९९६’ के प्रावधानों के अनुरूप लाने के लिए संशोधित नहीं किया गया है... इस समय निजी उद्योगों के लिए व्यक्तिगत और सामुदायिक भूमि का बलपूर्वक अधिग्रहण करने के लिए ज़मीनी स्तर पर औपनिवेशिक युग के इस क़ानून का व्यापक दुरुपयोग हो रहा है. कई मामलों में राज्य सरकार की परिपाटी पूंजीवादी घरानों के साथ उच्च स्तरीय क़रारनामों पर हस्ताक्षर करने और फिर ज़ाहिरा तौर पर राज्य औद्योगिक निगम के लिए जबरन भूमि के अधिग्रहण के उद्देश्य से अधिग्रहण अधिनियम को लागू करने की रही है. राज्य औद्योगिक निगम फिर बड़ी आसानी से अधिगृहीत भूमि को पट्टे पर निजी क्षेत्र के निगमों को दे देता है जो ’पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित) क़ानून, १९९६’ द्वारा अनुमोदित ’सार्वजनिक उद्देश्य से अधिग्रहण’ के बुनियादी आधार का पूरा उल्लंघन है.
"ऐसे भी मामले हैं जहां ग्राम सभाओं द्वारा विरोध व्यक्त करने वाले दस्तावेज़ों को नष्ट कर दिया गया है और उनकी जगह जाली दस्तावेज़ नत्थी कर दिये गये हैं. इस से भी बुरी बात यह है कि जब ये तथ्य उजागर भी हो गये, तब भी राज्य ने दोषी अधिकारियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की. सन्देश स्पष्ट और अमंगलसूचक है. इन सौदों में कई स्तरों पर सांठ-गांठ हुई है.
"इन सभी राज्यों में अनुसूची संख्या पांच के इलाक़ों में आदिवासियों की ज़मीनों को ग़ैर-आदिवासियों के हाथ बेचना निषिद्ध है. लेकिन हस्तान्तरण होते रहते हैं और उत्तर-उदारीकरण युग में और भी नुमायां हो गये हैं. मुख्य कारण हैं -- धोखेधड़ी वाले तरीक़ों से हस्तान्तरण, मौखिक सौदों के आधार पर अलिखित हस्तान्तरण, तथ्यों के ग़लत प्रस्तुतिकरण और उद्देश्यों की ग़लत बयानी के आधार पर हस्तान्तरण, आदिवासी भूमि पर बलपूर्वक क़ब्ज़ा करना, अवैध विवाहों के आधार पर हस्तान्तरण, सांठ-गांठ द्वारा मिल्कियत के दावे, सर्वेक्षण, भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया, अतिक्रमणों को हटाने के समय अभिलेखों में ग़लत इन्दराज और लकड़ी और वन्य उत्पादन के शोषण के नाम पर और यहां तक कि कल्याणकरिता के विकास के नाम पर हस्तान्तरण."
अपने निष्कर्ष वाले हिस्से में वे कहते हैं :
"खनन कम्पनियों समेत औद्योगिक घरानों के साथ राज्य सरकार द्वारा हस्ताक्षरित क़रारनामों को एक सार्वजनिक स्तर पर दोबारा जांचा जाना चाहिये जिसमें ग्राम सभाएं जांच के केन्द्र में हों."
तो यह है असलियत -- तंग करने वाले कार्यकर्ता नहीं, माओवादी नहीं, बल्कि एक सरकारी रिपोर्ट जो क़रारनामों की फिर से जांच की मांग कर रही है. और सरकार इस दस्तावेज़ के साथ क्या करती है ? उसकी प्रतिक्रिया क्या होती है ? २४ अप्रैल २०१० को एक औपचारिक समारोह में प्रधान मन्त्री इस रिपोर्ट को जारी करते हैं. बड़ी बहादुरी दिखाई, आप सोचेंगे. सिवा इसके कि जारी की गयी उस रिपोर्ट में यह अध्याय नहीं शामिल किया गया था. उसे काट कर निकाल दिया गया था.
आधी सदी पहले, मारे जाने के ठीक पहले चे गुएवारा ने लिखा था : " जब उत्पीड़नकारी शक्तियां उन क़ानूनों के खिलाफ़ अपने को सत्ता में बनाये रखती हैं जिन्हें उन्होंने ख़ुद स्थापित किया होता है तो यह मान लिया जाना चाहिए कि शान्ति भंग की जा चुकी है." बेशक. २००९ में मनमोहन सिंह ने संसद में कहा था "अगर वामपन्थी अतिवाद उन हिस्सों में जारी रहता है जहां खनिजों के प्राकृतिक स्रोत हैं तो पूंजी निवेश के वातावरण पर निश्चय ही असर पड़ेगा." यह युद्ध की गुप-चुप घोषणा थी.
(मुझे यहां एक छोटे-से विषयान्तर की इजाज़त दीजिए, दो सिक्खों के क़िस्से को बयान करने के लिए एक क्षण : १९३१ में ब्रिटिश सरकार द्वारा फांसी चढ़ाये जाने से पहले पंजाब के गवर्नर को भेजी गयी अपनी आख़िरी अर्ज़ी में महान क्रान्तिकारी और मार्क्सवादी भगत सिंह ने कहा था -- "हमें यह घोषित करने दीजिए कि युद्ध बाक़ायदा छिड़ा हुआ है और तब तक छिड़ा रहेगा जब तक मुट्ठी भर परजीवी हिन्दुस्तान की मेहनतकश जनता और उसके प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करते रहेंगे. वे चाहे पूरी तरह अंग्रेज़ पूंजीवादी हों या मिले-जुले अंग्रेज़ और हिन्दुस्तानी या पूरी तरह हिन्दुस्तानी ही क्यों न हों. चाहे वे अपना घातक और कपट-भरा शोषण मिले-जुले या विशुद्ध हिन्दुस्तानी नौकरशाही तन्त्र द्वारा चला रहे हों..इन सारी चीज़ों से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता." )
अगर आप उन सारे संघर्षों पर ग़ौर करें जो इस समय हिन्दुस्तान में जारी हैं, तो आप पायेंगे कि जनता अपने सम्वैधानिक अधिकारों से ज़्यादा और किसी चीज़ की मांग नहीं कर रही है. लेकिन भारत की सरकार को अब भारतीय सम्विधान के पालन की ज़रूरत नहीं महसूस हो रही है, जो ऐसा माना जाता है कि वह क़ानूनी और नैतिक ढांचा है जिस पर हमारा लोकतन्त्र टिका है. सम्विधानों के हिसाब से वह एक प्रबुद्ध दस्तावेज़ है, लेकिन उसके ज्ञान की दीप्ति को लोगों की रक्षा के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता. इसका बिलकुल उलट होता है. उसे एक कंटीली गदा की तरह उन लोगों को मार कर धूल चटाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है जो राज्य द्वारा "सार्वजनिक हित" के नाम पर अपनी जनता के ख़िलाफ़ ढायी जा रही बढ़ती हुई हिंसा का विरोध कर रहे हैं. "आउटलुक" पत्रिका में प्रकाशित अपने एक हालिया लेख में वरिष्ठ पत्रकार बी.जी. वर्गीज़ इस कांटों जड़ी गदा को राज्य और बड़े व्यापारिक निगमों के पक्ष में लहराते हुए अखाड़े में निकल आये : "माओवादी विलीन हो जायेंगे, लोकतान्त्रिक भारत और सम्विधान की जीत होगी, चाहे जितना समय इसमें लगे और चाहे जितनी तकलीफ़ इसमें क्यों न उठानी पड़े." इस लेख का जवाब आज़ाद ने दिया था ( यह अपनी हत्या किये जाने से पहले उसकी आख़िरी टिप्पणी थी) :
"हिन्दुस्तान के किस हिस्से में सम्विधान की जीत हो रही है, मिस्टर वर्गीज़ ? दन्तेवाड़ा में, बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर, राजनांदगांव में ? झारखण्ड में, ऊड़ीसा में ? लालगढ़, जंगलमहल में ? कश्मीर की घाटी में ? मणिपुर में ? हज़ारों सिक्खों के मारे जाने के बाद २५ लम्बे वर्षों तक आपका सम्विधान कहां छुपा हुआ था ? कहां छुपा हुआ था वह जब हज़ारों मुसलमानों का सफ़ाया कर दिया गया था ? जब लाखों किसानों को आत्म-हत्या करने पर मजबूर कर दिया गया है ? जब हज़ारों लोगों को राज्य समर्थित सल्वा जुडुम गिरोहों द्वारा हलाक़ कर दिया गया है ? जब आदिवासी औरतों के साथ बलात्कार किया गया है ? जब वर्दीधारी गुण्डों द्वारा लोगों का अपहरण होता है ? आपका सम्विधान काग़ज़ का ऐसा टुकड़ा है जिसकी क़ीमत विशाल बहुसंख्यक हिन्दुस्तानियों के लिए शौच साफ़ करने के चिथड़े (टायलेट पेपर ) जितनी भी नहीं है."
आज़ाद की हत्या के बाद मीडिया के अनेक टिप्पणीकारों ने इस अपराध की लीपा-पोती करने के लिए आज़ाद के शब्दों को बेशर्मी से उलट कर उस पर आरोप लगाया कि उसने भारतीय सम्विधान को शौच साफ़ करने वाला चिथड़ा कहा था.
अगर सरकार सम्विधान का सम्मान नहीं करेगी , तो शायद हमें उसकी प्रस्तावना के एक संशोधन की मांग करनी चाहिए. "हम, भारत की जनता, भारत को एक प्रभुसत्ता सम्पन्न समाजवादी धर्म-निरपेक्ष लोकतान्त्रिक गणतन्त्र बनाने के गम्भीर संकल्प के साथ...." की जगह लिखना चाहिये : "हम, भारत की सवर्ण जातियां और उच्च वर्ग, गुप्त रूप से भारत को एक कारपोरेट, पूंजीवादी, हिन्दू, कठपुतली राज्य बनाने के संकल्प के साथ...."
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हिन्दुस्तान के देहाती इलाक़ों में, खास तौर पर आदिवासी हृदय-प्रदेश में, बग़ावत, न केवल भारतीय राज्य व्यवस्था को, बल्कि प्रतिरोधी आन्दोलनों को भी एक क्रान्तिकारी चुनौती के रू-ब-रू ला खड़ा करती है. वह उन स्वीकृत विचारों पर सवाल उठाती है कि प्रगति, विकास, यहां तक कि सभ्यता के भी तत्व कौन-कौन-से हैं. वह प्रतिरोध की विभिन्न रणनीतियों की नैतिकता के साथ-साथ इस बात पर भी सवाल करती है कि वे कितनी असरदार हैं. बेशक, ये सवाल पहले भी किये गये हैं. वे लगातार, शान्तिपूर्वक, साल-दर-साल सौ तरीक़ों से पूछे गये हैं -- छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चे द्वारा, कोएल कारो और गन्धमर्दन आन्दोलनों द्वारा -- और सैकड़ों दूसरे जन संघर्षों द्वारा. इन्हें सबसे हठपूर्वक और शायद सबसे मुखर और नुमायां रूप में नर्मदा घाटी के बांध-विरोधी "नर्मदा बचाओ आन्दोलन" ने उठाया था. हिन्दुस्तान की हुकूमत का एकमात्र उत्तर दमन, छल-कपट ऐसी अस्पष्टता का रहा है जो आम लोगों के प्रति गहरे व्याधि-जनित अनादर ही का सूचक है. इस से भी बुरा यह रहा कि सरकार ने आगे बढ़ कर विस्थापन और बेदख़ली की प्रक्रिया को तेज़ करके ऐसे बिन्दु पर ला खड़ा किया जहां लोगों का आक्रोश उन रूपों में फूट पड़ा जिन्हें नियन्त्रित करना सम्भव नहीं रहा. आज दुनिया के सब से ग़रीब लोगों ने कुछ सबसे अमीर पूंजीवादी निगमों को बीच रास्ते रोक देने में सफलता पायी है. यह एक उल्लेखनीय कामयाबी है.
जो लोग उठ खड़े हुए हैं वे जानते हैं कि उनके देश में आपातकालीन स्थिति लागू है. उन्हें आभास है कि कश्मीर, नगालैण्ड, मणिपुर और असम की जनता की तरह उन्हें भी अवैध गतिविधि निरोधक अधिनियम और छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम जैसे क़ानूनों ने उनके नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिया है जो शब्द, कर्म, यहां तक इरादे के आधार पर भी हर तरह के विरोध और असहमति को अपराध ठहराते हैं.
जब इन्दिरा गांधी ने २५ जून १९७५ को आपातकाल लागू किया था तो इसका उद्देश्य आसन्न क्रान्ति को कुचलना था. जितने भी दारुण वे रहे हों वे ऐसे दिन थे जब लोग खुद को अपनी क़िस्मत संवारने का सपना, इन्साफ़ हासिल करने का सपना देखने की छूट दे सकते थे. बंगाल के नक्सलवादी विप्लव का कमो-बेश सफ़ाया हो चुका था. लेकिन फिर लाखों लोग जयप्रकाश नारायण के "सम्पूर्ण क्रान्ति" के आह्वान पर एकजुट हो गये थे. सारी उथल-पुथल और असन्तोष के मूल में वही मांग थी -- ज़मीन जोतनेवाले की हो. ( पीछे के उन दिनों में भी कोई फ़र्क़ नहीं था -- भूमि के पुनर्वितरण को लागू करने के लिए, जो सम्विधान के मार्ग-दर्शक सिद्धान्तों में से एक है, आपको क्रान्ति ही की ज़रूरत पड़ती थी. )
पैंतीस साल बाद हालात बुरी तरह बदल गये हैं. लगातार कुतरा-छीला जाने की वजह से उस शानदार, खूबसूरत ख़याल -- इन्साफ़ -- के मानी अब मानवाधिकार हो गये हैं. समता एक कपोल-कल्पना है. यह शब्द अब कमो-बेश हमारे शब्द-कोशों से निष्कासित कर दिया गया है. ग़रीबों को धकेल कर कगार तक पहुंचा दिया गया है. भूमिहीनों के लिए भूमि की लड़ाई लड़ने से हट कर क्रान्तिकारी पार्टियों और प्रतिरोध आन्दोलनों को अपना निशाना नीचे करके अब जनता के उन अधिकारों के लिए लड़ना पड़ रहा है जिससे लोग उस थोड़ी-सी ज़मीन को अपने क़ब्ज़े में रख सकें जो उनके पास है. भूमि के पुनर्वितरण का जो एकमात्र प्रकार अब भावी योजनाओं में है उसका उद्देश्य है -- भूमि को ग़रीबों से छीन कर अमीरों को उनके भूमि बैंकों के लिए देना जो विशेष आर्थिक क्षेत्रों के नाम से जाने जाते हैं. भूमिहीन (ज़्यादातर दलित ), बेरोज़गार, झुग्गियों और मलिन बस्तियों के निवासी और शहरी मज़दूर तबक़ा अब मोटे तौर पर गिनती के बाहर है. पश्चिम बंगाल की लालगढ़ जैसी जगहों में लोग अब पुलिस से महज़ यही कह रहे हैं कि उन्हें अकेला छोड़ दिया जाये. वहां पुलिस सन्त्रास विरोधी जनगणेर समिति ने सिर्फ़ एक छोटी-सी मांग से शुरुआत की थी कि पुलिस अधीक्षक लालगढ़ जा कर लोगों से उन अत्याचारों के लिए क्षमा मांगें जो उनके जवानों ने लोगों पर किये थे. इस मांग को बेतुका और बेवक़ूफ़ाना माना गया. ( अधनंगे जंगलियों की यह हिम्मत कि वे इस बात की अपेक्षा रखें कि एक सरकारी अफ़सर जा कर उनसे माफ़ी मांगेगा ?) लिहाज़ा लोगों ने अपने गांवों की घेरेबन्दी कर दी और पुलिस को भीतर आने से रोक दिया. पुलिस ने हिंसा तेज़ कर दी. लोगों ने आक्रोश-भरी जवाबी कार्रवाई की. अब, दो साल के अर्से और अनेक नृशंस बलात्कारों, हत्याओं और झूठी मुठभेड़ों के बाद खुल्लम-खुल्ला युद्ध की स्थिति है. पुलिस सन्त्रास विरोधी जनगणेर समिति पर पाबन्दी लगा दी गयी है और उसे माओवादी संगठन घोषित कर दिया गया है. उसके नेता या तो जेल में ठूंस दिये गये हैं या उन्हें गोली मार दी गयी है. ( ऐसी ही नियति ऊड़ीसा में नारायणपटना के चासी मूल्य आदिवासी संघ और झारखण्ड में पोट्का के विस्थापन विरोधी एकता मंच की रही है.)
जो लोग एक समय में न्याय और समता के सपने देखते थे और खेत जोतने वाले को मिले की मांग बुलन्द करते थे उन्हें आज इतना नीचे उतार दिया गया है कि वे यह मांग करने लगे हैं कि पुलिस उन्हें मारने-पीटने और उन पर अत्याचार करने के लिए माफ़ी मांगे -- क्या यह प्रगति है ?
आपातकाल के दौरान, कहते हैं, जब श्रीमती गांधी प्रेसवालों को झुकने के लिए कहती थीं तो वे रेंगने लगते थे. और तिस पर भी, उन दिनों में ऐसी मिसालें थींजब राष्ट्रीय दैनिकों ने सेन्सरशिप का विरोध करते हुए चुनौती-भरे अन्दाज़ में कोरे सम्पादकीय छापे थे. ( विडम्बनाओं की विडम्बना यह है कि उन में से एक निर्भीक सम्पादक बी.जी. वर्गीज़ थे.) इस बार इस अघोषित आपातकाल में चुनौतियों की बहुत गुंजाइश नहीं है क्योंकि मीडिया ही सरकार है.कोई भी, सिवा उन पूंजीवादी घरानों और निगमों के जिनका उस पर नियन्त्रण है, उसे यह नहीं बता सकता कि वह क्या करे. वरिष्ठ राजनेता, मन्त्री और सुरक्षा व्यवस्था के अफ़सर टेलीविज़न पर आने के लिए लालायित रहते हैं, दुर्बल स्वरों में अर्नब गोस्वामी और बर्खा दत्त से बिनती करते हुए कि उन्हें उस दिन के प्रवचन में कुछ अपनी ओर से भी कहने की मोहलत दी जाये.कई टीवी चैनल और समाचार-पत्र छुपे तौर पर औपरेशन ग्रीनहण्ट के युद्ध कक्ष और उसके द्वारा ग़लत सूचनाएं प्रसारित करने के अभियान का संचालन कर रहे हैं. कई अख़बारों में भिन्न-भिन्न रिपोर्टरों के नाम से लेकिन हू-ब-हू उन्हीं लफ़्ज़ों में "माओवादियों के १५०० करोड़ के उद्योग" की खबर छपी. लगभग सभी अख़बारों और समाचार चैनलों ने मई २०१० में झाग्राम (पश्चिम बंगाल ) में पटरी से रेल के उतर जाने की भयानक घटना के लिए, जिसमे १४० लोग मारे गये, पुलिस सन्त्रास विरोधी जनगणेर समिति को ( "माओवादियों" से अदल-बदल कर इस्तेमाल करके) दोषी ठहराते हुए ख़बरें छापीं. दो प्रमुख सन्दिग्ध लोगों को "मुठभेड़ों" में पुलिस ने मार गिराया है इस बात के बवजूद कि उस घटना के गिर्द छाया रहस्य अब तक खुल रहा है. प्रेस ट्रस्ट औफ़ इण्डिया ने कई झूठी ख़बरें जारी के हैं जिन्हें इण्डियन एक्सप्रेस ने वफ़ादारी से सुर्ख़ियों में छापा है जिनमें वह ख़बर भी शामिल है जिसमें कहा गया था कि माओवादियों ने अपने द्वारा मारे गये पुलिसवालों के शवों को टुकड़े-टुकड़े कर दिया था. (इसका खण्डन जो खुद पुलिस की तरफ़ से आया था, बीच के किसी पन्ने पर डाक टिकट के आकार मॆं छापा गया.) कई हू-ब-हू एक जैसे इण्टर्व्यू छपे हैं -- सब "एक्सक्लूसिव" की सुर्ख़ी के साथ -- उस महिला छापामार के बारे में कि कैसे माओवादी नेताओं ने उसके साथ बलात्कार और फिर-फिर बलात्कार किया. बताया गया कि वह हाल ही में जंगलों और माओवादियों के चंगुलों से छूट कर दुनिया को अपनी कहानी सुनाने के लिए भाग निकली थी. अब पता चल रहा है कि वह महीनों से पुलिस की हिरासत में थी.
हमारे टीवी पटल पर चिल्ला-चिल्ला कर प्रसारित किये जा रहे अत्याचार आधारित विश्लेषणों का उद्देश्य आईने को धुंधला बना कर हमें यह सोचने पर विवश करना है कि " हां, आदिवासी नज़रन्दाज़ किये गये हैं और बड़े बुरे दौर से गुज़र रहे हैं; हां, उन्हें विकास की ज़रूरत है; हां, सरकार का दोष है और यह बड़े अफ़सोस की बात है. लेकिन फ़िलहाल संकट की घड़ी है. हमें माओवादियों से छुटकारा पाने और देश को सुरक्षित करने की ज़रूरत है और फिर हम आदिवासियों की मदद कर सकते हैं.
अगली किस्त में पढ़िये सरकार द्वारा संचालित युद्ध का ब्योरा
क्या माओवादी भारत के सम्विधान की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं ?
अब जबकि खनन के लाइसेंस ऐसी त्वरा से जारी कर दिये गये हैं जिसे आप घबराहट में कौड़ियों के दाम की जा रही बिक्री से जोड़ कर देखते आये हैं, और जो घोटाले उभर कर सामने आ रहे हैं वे करोड़ों डालरों में कूते गये हैं, अब जबकि खनन कम्पनियों ने नदियों को प्रदूषित कर दिया है, प्रान्तों की सरहदों को खनन से खोखला बना दिया है, पर्यावरण की ऐसी-तैसी कर दी है और गृह-युद्ध छिड़वा दिया है, चुड़ैल-सभा की लगायी हुई आग के नतीजे सामने आने लगे हैं -- और हाय-तौबा भी -- तहस-नहस इलाक़े और ग़रीबों के शवों पर पढ़े जा रहे किसी पौराणिक फ़ातिहे की तरह.
ज़रा उस खेद पर ध्यान दीजिए जिससे मन्त्री महोदय अपने व्याख्यान में लोकतन्त्र और उससे जुड़ी ज़िम्मेदारियों की बात करते हैं : "लोकतन्त्र -- या कहा जाये कि लोकतान्त्रिक संस्थाओं और समाजवादी युग की विरासत -- ने वास्तव में विकास की चुनौतियां बढ़ा दी हैं." इसके बाद वे मुआवज़ों, पुनर्वास और रोज़गार के मुद्दों से सम्बन्धित उन्हीं पिटे-पिटाये झूठों की झड़ी लगा देते हैं.
कैसा मुआवज़ा ? कैसी क्षतिपूर्ति ? कैसा पुनर्वास ? और कौन-सी "हर परिवार के लिए एक नौकरी ?" (हिन्दुस्तान में साठ साल के औद्योगीकरण ने सिर्फ़ मज़दूरों की कुल संख्या की ६ फ़ीसदी के लिए रोज़गार का बन्दोबस्त किया है. रही बात भूमि के "अनिवार्य अधिग्रहण" का "औचित्य" साबित करने की "बन्दिश" की तो एक मन्त्री निश्चित रूप से जानता है कि आदिवासियों की भूमि ( जहां सबसे अधिक खनिजों की भारी मात्रा है) का अनिवार्यत: अधिग्रहण करना और उसे निजी खनन कम्पनियों के हवाले कर देना "पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित) अधिनियम" के अन्तर्गत ग़ैर-क़ानूनी और असंवैधानिक है. १९९६ में पारित पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित) अधिनियम एक संशोधन है जिसके माध्यम से आदिवासियों के साथ की गयी कुछ नाइन्साफ़ियों को दुरुस्त करने की कोशिश की गयी है जो १९५० में संसद द्वारा स्वीकृत भारतीय सम्विधान में निहित थीं. वह ऐसे सभी क़ानूनों को निरस्त कर देता है जो उसके प्रावधानों के विरुद्ध जा सकते हैं. यह क़ानून स्वीकार करता है कि आदिवासी समुदाय उत्तरोत्तर बढ़ती हुई मात्रा में हाशिये पर चले गये हैं और इस का उद्देश्य इस शक्ति-सन्तुलन को क्रान्तिकारी ढंग से बराबरी की तरफ़ संशोधित करने का है. क़ानून के एक नमूने की हैसियत से यह अनोखा है, क्योंकि यह समूह -- समुदाय -- को एक क़ानूनी हैसियत प्रदान करता है और यह अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों को स्व-शासन का अधिकार देता है. पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित) अधिनियम, १९९६ के अन्तर्गत आदिवासी भूमि के "अनिवार्य अधिग्रहण" को किसी भी दलील से सही नहीं ठहराया जा सकता. लिहाज़ा, यह विडम्बना ही है कि जिन लोगों को "माओवादी" कहा जा रहा है (जिनमें वे सभी शामिल हैं जो भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं) दरअसल सम्विधान की रक्षा करने के लिए ही लड़ रहे हैं, जबकि सरकार उसका उल्लंघन और तिरस्कार करने की भरसक कोशिश कर रही है.
२००८ और २००९ के बीच पंचायती राज मन्त्रालय ने दो शोधार्थियों को देश में पंचायती राज की प्रगति के बारे में तैयार की जा रही एक रिपोर्ट के लिए एक अध्याय लिखने का काम सौंपा. अध्याय का शीर्षक है "पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित) क़ानून, १९९६, वामपन्थी अतिवाद और शासन : भारत के आदिवासी इलाक़ों में चिन्ताएं और चुनौतियां" और इसके लेखक हैं अजय दाण्डेकर और चित्रांगदा चौधरी. इसके कुछ उद्धरण नीचे दिये जा रहे हैं :
"१८९४ का केन्द्रीय भूमि अधिग्रहण अधिनियम आज तक ’पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित) क़ानून, १९९६’ के प्रावधानों के अनुरूप लाने के लिए संशोधित नहीं किया गया है... इस समय निजी उद्योगों के लिए व्यक्तिगत और सामुदायिक भूमि का बलपूर्वक अधिग्रहण करने के लिए ज़मीनी स्तर पर औपनिवेशिक युग के इस क़ानून का व्यापक दुरुपयोग हो रहा है. कई मामलों में राज्य सरकार की परिपाटी पूंजीवादी घरानों के साथ उच्च स्तरीय क़रारनामों पर हस्ताक्षर करने और फिर ज़ाहिरा तौर पर राज्य औद्योगिक निगम के लिए जबरन भूमि के अधिग्रहण के उद्देश्य से अधिग्रहण अधिनियम को लागू करने की रही है. राज्य औद्योगिक निगम फिर बड़ी आसानी से अधिगृहीत भूमि को पट्टे पर निजी क्षेत्र के निगमों को दे देता है जो ’पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित) क़ानून, १९९६’ द्वारा अनुमोदित ’सार्वजनिक उद्देश्य से अधिग्रहण’ के बुनियादी आधार का पूरा उल्लंघन है.
"ऐसे भी मामले हैं जहां ग्राम सभाओं द्वारा विरोध व्यक्त करने वाले दस्तावेज़ों को नष्ट कर दिया गया है और उनकी जगह जाली दस्तावेज़ नत्थी कर दिये गये हैं. इस से भी बुरी बात यह है कि जब ये तथ्य उजागर भी हो गये, तब भी राज्य ने दोषी अधिकारियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की. सन्देश स्पष्ट और अमंगलसूचक है. इन सौदों में कई स्तरों पर सांठ-गांठ हुई है.
"इन सभी राज्यों में अनुसूची संख्या पांच के इलाक़ों में आदिवासियों की ज़मीनों को ग़ैर-आदिवासियों के हाथ बेचना निषिद्ध है. लेकिन हस्तान्तरण होते रहते हैं और उत्तर-उदारीकरण युग में और भी नुमायां हो गये हैं. मुख्य कारण हैं -- धोखेधड़ी वाले तरीक़ों से हस्तान्तरण, मौखिक सौदों के आधार पर अलिखित हस्तान्तरण, तथ्यों के ग़लत प्रस्तुतिकरण और उद्देश्यों की ग़लत बयानी के आधार पर हस्तान्तरण, आदिवासी भूमि पर बलपूर्वक क़ब्ज़ा करना, अवैध विवाहों के आधार पर हस्तान्तरण, सांठ-गांठ द्वारा मिल्कियत के दावे, सर्वेक्षण, भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया, अतिक्रमणों को हटाने के समय अभिलेखों में ग़लत इन्दराज और लकड़ी और वन्य उत्पादन के शोषण के नाम पर और यहां तक कि कल्याणकरिता के विकास के नाम पर हस्तान्तरण."
अपने निष्कर्ष वाले हिस्से में वे कहते हैं :
"खनन कम्पनियों समेत औद्योगिक घरानों के साथ राज्य सरकार द्वारा हस्ताक्षरित क़रारनामों को एक सार्वजनिक स्तर पर दोबारा जांचा जाना चाहिये जिसमें ग्राम सभाएं जांच के केन्द्र में हों."
तो यह है असलियत -- तंग करने वाले कार्यकर्ता नहीं, माओवादी नहीं, बल्कि एक सरकारी रिपोर्ट जो क़रारनामों की फिर से जांच की मांग कर रही है. और सरकार इस दस्तावेज़ के साथ क्या करती है ? उसकी प्रतिक्रिया क्या होती है ? २४ अप्रैल २०१० को एक औपचारिक समारोह में प्रधान मन्त्री इस रिपोर्ट को जारी करते हैं. बड़ी बहादुरी दिखाई, आप सोचेंगे. सिवा इसके कि जारी की गयी उस रिपोर्ट में यह अध्याय नहीं शामिल किया गया था. उसे काट कर निकाल दिया गया था.
आधी सदी पहले, मारे जाने के ठीक पहले चे गुएवारा ने लिखा था : " जब उत्पीड़नकारी शक्तियां उन क़ानूनों के खिलाफ़ अपने को सत्ता में बनाये रखती हैं जिन्हें उन्होंने ख़ुद स्थापित किया होता है तो यह मान लिया जाना चाहिए कि शान्ति भंग की जा चुकी है." बेशक. २००९ में मनमोहन सिंह ने संसद में कहा था "अगर वामपन्थी अतिवाद उन हिस्सों में जारी रहता है जहां खनिजों के प्राकृतिक स्रोत हैं तो पूंजी निवेश के वातावरण पर निश्चय ही असर पड़ेगा." यह युद्ध की गुप-चुप घोषणा थी.
(मुझे यहां एक छोटे-से विषयान्तर की इजाज़त दीजिए, दो सिक्खों के क़िस्से को बयान करने के लिए एक क्षण : १९३१ में ब्रिटिश सरकार द्वारा फांसी चढ़ाये जाने से पहले पंजाब के गवर्नर को भेजी गयी अपनी आख़िरी अर्ज़ी में महान क्रान्तिकारी और मार्क्सवादी भगत सिंह ने कहा था -- "हमें यह घोषित करने दीजिए कि युद्ध बाक़ायदा छिड़ा हुआ है और तब तक छिड़ा रहेगा जब तक मुट्ठी भर परजीवी हिन्दुस्तान की मेहनतकश जनता और उसके प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करते रहेंगे. वे चाहे पूरी तरह अंग्रेज़ पूंजीवादी हों या मिले-जुले अंग्रेज़ और हिन्दुस्तानी या पूरी तरह हिन्दुस्तानी ही क्यों न हों. चाहे वे अपना घातक और कपट-भरा शोषण मिले-जुले या विशुद्ध हिन्दुस्तानी नौकरशाही तन्त्र द्वारा चला रहे हों..इन सारी चीज़ों से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता." )
अगर आप उन सारे संघर्षों पर ग़ौर करें जो इस समय हिन्दुस्तान में जारी हैं, तो आप पायेंगे कि जनता अपने सम्वैधानिक अधिकारों से ज़्यादा और किसी चीज़ की मांग नहीं कर रही है. लेकिन भारत की सरकार को अब भारतीय सम्विधान के पालन की ज़रूरत नहीं महसूस हो रही है, जो ऐसा माना जाता है कि वह क़ानूनी और नैतिक ढांचा है जिस पर हमारा लोकतन्त्र टिका है. सम्विधानों के हिसाब से वह एक प्रबुद्ध दस्तावेज़ है, लेकिन उसके ज्ञान की दीप्ति को लोगों की रक्षा के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता. इसका बिलकुल उलट होता है. उसे एक कंटीली गदा की तरह उन लोगों को मार कर धूल चटाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है जो राज्य द्वारा "सार्वजनिक हित" के नाम पर अपनी जनता के ख़िलाफ़ ढायी जा रही बढ़ती हुई हिंसा का विरोध कर रहे हैं. "आउटलुक" पत्रिका में प्रकाशित अपने एक हालिया लेख में वरिष्ठ पत्रकार बी.जी. वर्गीज़ इस कांटों जड़ी गदा को राज्य और बड़े व्यापारिक निगमों के पक्ष में लहराते हुए अखाड़े में निकल आये : "माओवादी विलीन हो जायेंगे, लोकतान्त्रिक भारत और सम्विधान की जीत होगी, चाहे जितना समय इसमें लगे और चाहे जितनी तकलीफ़ इसमें क्यों न उठानी पड़े." इस लेख का जवाब आज़ाद ने दिया था ( यह अपनी हत्या किये जाने से पहले उसकी आख़िरी टिप्पणी थी) :
"हिन्दुस्तान के किस हिस्से में सम्विधान की जीत हो रही है, मिस्टर वर्गीज़ ? दन्तेवाड़ा में, बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर, राजनांदगांव में ? झारखण्ड में, ऊड़ीसा में ? लालगढ़, जंगलमहल में ? कश्मीर की घाटी में ? मणिपुर में ? हज़ारों सिक्खों के मारे जाने के बाद २५ लम्बे वर्षों तक आपका सम्विधान कहां छुपा हुआ था ? कहां छुपा हुआ था वह जब हज़ारों मुसलमानों का सफ़ाया कर दिया गया था ? जब लाखों किसानों को आत्म-हत्या करने पर मजबूर कर दिया गया है ? जब हज़ारों लोगों को राज्य समर्थित सल्वा जुडुम गिरोहों द्वारा हलाक़ कर दिया गया है ? जब आदिवासी औरतों के साथ बलात्कार किया गया है ? जब वर्दीधारी गुण्डों द्वारा लोगों का अपहरण होता है ? आपका सम्विधान काग़ज़ का ऐसा टुकड़ा है जिसकी क़ीमत विशाल बहुसंख्यक हिन्दुस्तानियों के लिए शौच साफ़ करने के चिथड़े (टायलेट पेपर ) जितनी भी नहीं है."
आज़ाद की हत्या के बाद मीडिया के अनेक टिप्पणीकारों ने इस अपराध की लीपा-पोती करने के लिए आज़ाद के शब्दों को बेशर्मी से उलट कर उस पर आरोप लगाया कि उसने भारतीय सम्विधान को शौच साफ़ करने वाला चिथड़ा कहा था.
अगर सरकार सम्विधान का सम्मान नहीं करेगी , तो शायद हमें उसकी प्रस्तावना के एक संशोधन की मांग करनी चाहिए. "हम, भारत की जनता, भारत को एक प्रभुसत्ता सम्पन्न समाजवादी धर्म-निरपेक्ष लोकतान्त्रिक गणतन्त्र बनाने के गम्भीर संकल्प के साथ...." की जगह लिखना चाहिये : "हम, भारत की सवर्ण जातियां और उच्च वर्ग, गुप्त रूप से भारत को एक कारपोरेट, पूंजीवादी, हिन्दू, कठपुतली राज्य बनाने के संकल्प के साथ...."
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हिन्दुस्तान के देहाती इलाक़ों में, खास तौर पर आदिवासी हृदय-प्रदेश में, बग़ावत, न केवल भारतीय राज्य व्यवस्था को, बल्कि प्रतिरोधी आन्दोलनों को भी एक क्रान्तिकारी चुनौती के रू-ब-रू ला खड़ा करती है. वह उन स्वीकृत विचारों पर सवाल उठाती है कि प्रगति, विकास, यहां तक कि सभ्यता के भी तत्व कौन-कौन-से हैं. वह प्रतिरोध की विभिन्न रणनीतियों की नैतिकता के साथ-साथ इस बात पर भी सवाल करती है कि वे कितनी असरदार हैं. बेशक, ये सवाल पहले भी किये गये हैं. वे लगातार, शान्तिपूर्वक, साल-दर-साल सौ तरीक़ों से पूछे गये हैं -- छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चे द्वारा, कोएल कारो और गन्धमर्दन आन्दोलनों द्वारा -- और सैकड़ों दूसरे जन संघर्षों द्वारा. इन्हें सबसे हठपूर्वक और शायद सबसे मुखर और नुमायां रूप में नर्मदा घाटी के बांध-विरोधी "नर्मदा बचाओ आन्दोलन" ने उठाया था. हिन्दुस्तान की हुकूमत का एकमात्र उत्तर दमन, छल-कपट ऐसी अस्पष्टता का रहा है जो आम लोगों के प्रति गहरे व्याधि-जनित अनादर ही का सूचक है. इस से भी बुरा यह रहा कि सरकार ने आगे बढ़ कर विस्थापन और बेदख़ली की प्रक्रिया को तेज़ करके ऐसे बिन्दु पर ला खड़ा किया जहां लोगों का आक्रोश उन रूपों में फूट पड़ा जिन्हें नियन्त्रित करना सम्भव नहीं रहा. आज दुनिया के सब से ग़रीब लोगों ने कुछ सबसे अमीर पूंजीवादी निगमों को बीच रास्ते रोक देने में सफलता पायी है. यह एक उल्लेखनीय कामयाबी है.
जो लोग उठ खड़े हुए हैं वे जानते हैं कि उनके देश में आपातकालीन स्थिति लागू है. उन्हें आभास है कि कश्मीर, नगालैण्ड, मणिपुर और असम की जनता की तरह उन्हें भी अवैध गतिविधि निरोधक अधिनियम और छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम जैसे क़ानूनों ने उनके नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिया है जो शब्द, कर्म, यहां तक इरादे के आधार पर भी हर तरह के विरोध और असहमति को अपराध ठहराते हैं.
जब इन्दिरा गांधी ने २५ जून १९७५ को आपातकाल लागू किया था तो इसका उद्देश्य आसन्न क्रान्ति को कुचलना था. जितने भी दारुण वे रहे हों वे ऐसे दिन थे जब लोग खुद को अपनी क़िस्मत संवारने का सपना, इन्साफ़ हासिल करने का सपना देखने की छूट दे सकते थे. बंगाल के नक्सलवादी विप्लव का कमो-बेश सफ़ाया हो चुका था. लेकिन फिर लाखों लोग जयप्रकाश नारायण के "सम्पूर्ण क्रान्ति" के आह्वान पर एकजुट हो गये थे. सारी उथल-पुथल और असन्तोष के मूल में वही मांग थी -- ज़मीन जोतनेवाले की हो. ( पीछे के उन दिनों में भी कोई फ़र्क़ नहीं था -- भूमि के पुनर्वितरण को लागू करने के लिए, जो सम्विधान के मार्ग-दर्शक सिद्धान्तों में से एक है, आपको क्रान्ति ही की ज़रूरत पड़ती थी. )
पैंतीस साल बाद हालात बुरी तरह बदल गये हैं. लगातार कुतरा-छीला जाने की वजह से उस शानदार, खूबसूरत ख़याल -- इन्साफ़ -- के मानी अब मानवाधिकार हो गये हैं. समता एक कपोल-कल्पना है. यह शब्द अब कमो-बेश हमारे शब्द-कोशों से निष्कासित कर दिया गया है. ग़रीबों को धकेल कर कगार तक पहुंचा दिया गया है. भूमिहीनों के लिए भूमि की लड़ाई लड़ने से हट कर क्रान्तिकारी पार्टियों और प्रतिरोध आन्दोलनों को अपना निशाना नीचे करके अब जनता के उन अधिकारों के लिए लड़ना पड़ रहा है जिससे लोग उस थोड़ी-सी ज़मीन को अपने क़ब्ज़े में रख सकें जो उनके पास है. भूमि के पुनर्वितरण का जो एकमात्र प्रकार अब भावी योजनाओं में है उसका उद्देश्य है -- भूमि को ग़रीबों से छीन कर अमीरों को उनके भूमि बैंकों के लिए देना जो विशेष आर्थिक क्षेत्रों के नाम से जाने जाते हैं. भूमिहीन (ज़्यादातर दलित ), बेरोज़गार, झुग्गियों और मलिन बस्तियों के निवासी और शहरी मज़दूर तबक़ा अब मोटे तौर पर गिनती के बाहर है. पश्चिम बंगाल की लालगढ़ जैसी जगहों में लोग अब पुलिस से महज़ यही कह रहे हैं कि उन्हें अकेला छोड़ दिया जाये. वहां पुलिस सन्त्रास विरोधी जनगणेर समिति ने सिर्फ़ एक छोटी-सी मांग से शुरुआत की थी कि पुलिस अधीक्षक लालगढ़ जा कर लोगों से उन अत्याचारों के लिए क्षमा मांगें जो उनके जवानों ने लोगों पर किये थे. इस मांग को बेतुका और बेवक़ूफ़ाना माना गया. ( अधनंगे जंगलियों की यह हिम्मत कि वे इस बात की अपेक्षा रखें कि एक सरकारी अफ़सर जा कर उनसे माफ़ी मांगेगा ?) लिहाज़ा लोगों ने अपने गांवों की घेरेबन्दी कर दी और पुलिस को भीतर आने से रोक दिया. पुलिस ने हिंसा तेज़ कर दी. लोगों ने आक्रोश-भरी जवाबी कार्रवाई की. अब, दो साल के अर्से और अनेक नृशंस बलात्कारों, हत्याओं और झूठी मुठभेड़ों के बाद खुल्लम-खुल्ला युद्ध की स्थिति है. पुलिस सन्त्रास विरोधी जनगणेर समिति पर पाबन्दी लगा दी गयी है और उसे माओवादी संगठन घोषित कर दिया गया है. उसके नेता या तो जेल में ठूंस दिये गये हैं या उन्हें गोली मार दी गयी है. ( ऐसी ही नियति ऊड़ीसा में नारायणपटना के चासी मूल्य आदिवासी संघ और झारखण्ड में पोट्का के विस्थापन विरोधी एकता मंच की रही है.)
जो लोग एक समय में न्याय और समता के सपने देखते थे और खेत जोतने वाले को मिले की मांग बुलन्द करते थे उन्हें आज इतना नीचे उतार दिया गया है कि वे यह मांग करने लगे हैं कि पुलिस उन्हें मारने-पीटने और उन पर अत्याचार करने के लिए माफ़ी मांगे -- क्या यह प्रगति है ?
आपातकाल के दौरान, कहते हैं, जब श्रीमती गांधी प्रेसवालों को झुकने के लिए कहती थीं तो वे रेंगने लगते थे. और तिस पर भी, उन दिनों में ऐसी मिसालें थींजब राष्ट्रीय दैनिकों ने सेन्सरशिप का विरोध करते हुए चुनौती-भरे अन्दाज़ में कोरे सम्पादकीय छापे थे. ( विडम्बनाओं की विडम्बना यह है कि उन में से एक निर्भीक सम्पादक बी.जी. वर्गीज़ थे.) इस बार इस अघोषित आपातकाल में चुनौतियों की बहुत गुंजाइश नहीं है क्योंकि मीडिया ही सरकार है.कोई भी, सिवा उन पूंजीवादी घरानों और निगमों के जिनका उस पर नियन्त्रण है, उसे यह नहीं बता सकता कि वह क्या करे. वरिष्ठ राजनेता, मन्त्री और सुरक्षा व्यवस्था के अफ़सर टेलीविज़न पर आने के लिए लालायित रहते हैं, दुर्बल स्वरों में अर्नब गोस्वामी और बर्खा दत्त से बिनती करते हुए कि उन्हें उस दिन के प्रवचन में कुछ अपनी ओर से भी कहने की मोहलत दी जाये.कई टीवी चैनल और समाचार-पत्र छुपे तौर पर औपरेशन ग्रीनहण्ट के युद्ध कक्ष और उसके द्वारा ग़लत सूचनाएं प्रसारित करने के अभियान का संचालन कर रहे हैं. कई अख़बारों में भिन्न-भिन्न रिपोर्टरों के नाम से लेकिन हू-ब-हू उन्हीं लफ़्ज़ों में "माओवादियों के १५०० करोड़ के उद्योग" की खबर छपी. लगभग सभी अख़बारों और समाचार चैनलों ने मई २०१० में झाग्राम (पश्चिम बंगाल ) में पटरी से रेल के उतर जाने की भयानक घटना के लिए, जिसमे १४० लोग मारे गये, पुलिस सन्त्रास विरोधी जनगणेर समिति को ( "माओवादियों" से अदल-बदल कर इस्तेमाल करके) दोषी ठहराते हुए ख़बरें छापीं. दो प्रमुख सन्दिग्ध लोगों को "मुठभेड़ों" में पुलिस ने मार गिराया है इस बात के बवजूद कि उस घटना के गिर्द छाया रहस्य अब तक खुल रहा है. प्रेस ट्रस्ट औफ़ इण्डिया ने कई झूठी ख़बरें जारी के हैं जिन्हें इण्डियन एक्सप्रेस ने वफ़ादारी से सुर्ख़ियों में छापा है जिनमें वह ख़बर भी शामिल है जिसमें कहा गया था कि माओवादियों ने अपने द्वारा मारे गये पुलिसवालों के शवों को टुकड़े-टुकड़े कर दिया था. (इसका खण्डन जो खुद पुलिस की तरफ़ से आया था, बीच के किसी पन्ने पर डाक टिकट के आकार मॆं छापा गया.) कई हू-ब-हू एक जैसे इण्टर्व्यू छपे हैं -- सब "एक्सक्लूसिव" की सुर्ख़ी के साथ -- उस महिला छापामार के बारे में कि कैसे माओवादी नेताओं ने उसके साथ बलात्कार और फिर-फिर बलात्कार किया. बताया गया कि वह हाल ही में जंगलों और माओवादियों के चंगुलों से छूट कर दुनिया को अपनी कहानी सुनाने के लिए भाग निकली थी. अब पता चल रहा है कि वह महीनों से पुलिस की हिरासत में थी.
हमारे टीवी पटल पर चिल्ला-चिल्ला कर प्रसारित किये जा रहे अत्याचार आधारित विश्लेषणों का उद्देश्य आईने को धुंधला बना कर हमें यह सोचने पर विवश करना है कि " हां, आदिवासी नज़रन्दाज़ किये गये हैं और बड़े बुरे दौर से गुज़र रहे हैं; हां, उन्हें विकास की ज़रूरत है; हां, सरकार का दोष है और यह बड़े अफ़सोस की बात है. लेकिन फ़िलहाल संकट की घड़ी है. हमें माओवादियों से छुटकारा पाने और देश को सुरक्षित करने की ज़रूरत है और फिर हम आदिवासियों की मदद कर सकते हैं.
अगली किस्त में पढ़िये सरकार द्वारा संचालित युद्ध का ब्योरा
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