Wednesday, July 28, 2010

डायर की वक़ालत

लेकिन ये प्रदूषित वर्ष हैं, हमारे;
दूर मारे गये आदमियों का ख़ून उछलता है लहरों में,
लहरें रंग देती हैं हमें, छींटे पड़ते हैं चांद पर.
दूर के ये अज़ाब हमारे हैं और उत्पीड़ितों के लिए संघर्ष
मेरे स्वभाव की एक कठोर शिरा है.


शायद यह लड़ाई गुज़र जायेगी दूसरी लड़ाइयों की तरह
जिन्हों ने हमें बांटे रखा, हमें मरा हुआ हुई,
हत्यारों के साथ हमारी हत्या करती हुई,
लेकिन इस समय की शर्मिन्दगी छूती है
अपनी जलती हुई उंगलियों से हमारे चेहरे,
कौन मिटायेगा निर्दोषों की हत्या में छुपी क्रूरता ?

--पाब्लो नेरुदा

आख़िरकार जैसा कि अंग्रेज़ी में कहते हैं बिल्ली बैग से बाहर आ ही गयी. हंस के सालाना जलसे पर सम्पादक राजेन्द्र जी ने ख़ामोशी तोड़ कर अपनी ओर से एक स्पष्टीकरण दे ही डाला. ऐसा लगता है कि बहस का राग अलापने वाले राजेन्द्र जी ख़ुद बहस में तभी उतरते हैं जब उन्हें यक़ीन हो जाता है कि उनकी ओर से मोर्चा संभालने वाले सिपहसालार नाकाम साबित हुए हैं या फिर उन्हें लगता है कि आख़िरी वार करने का अवसर अब उन्हीं के हाथ में है. वरना हंस के सालाना जलसे पर जिन्हें ऐतराज़ था वे तो अपनी बात कभी के कह चुके थे. लेकिन सम्भव है राजेन्द्र जी को लगा हो कि मोहल्ला ब्लौग के महारथी हमारे प्यारे साथी अविनाश जी और राजेन्द्र जी के बग़लबच्चे समरेन्द्र बहादुर शायद सफल नहीं हुए, लिहाज़ा हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के भीष्म पितामह को अन्तत: मैदान में उतरना ही पड़ा है.

लेकिन अपने पक्ष को किसी भी तरह सही साबित करने की फ़िक्र में अपने सम्पाद्कीय में राजेन्द्र जी ने दो बुनियादी चूकें की हैं. पहली चूक सैद्धान्तिक है. वे लिखते हैं -- "हंस हमेशा एक लोकतांत्रिक विमर्श में विश्‍वास करता रहा है। हमारा मानना है कि एकतरफा बौद्धिक बहस का कोई अर्थ नहीं है। वह प्रवचन होता है। जब तक प्रतिपक्ष न हो, उसे बहस का नाम देना भी गलत है। हमने अपनी गोष्ठियों में प्रतिपक्ष को बराबरी की हिस्‍सेदारी दी है। जब भारतीयता की अवधारणा पर गोष्‍ठी हुई, तो हमने बीजेपी के सिद्धांतकार शेषाद्रिचारी को भी आमंत्रित किया था। अब इस बार सोचा था कि क्‍यों न प्रतिपक्ष के लिए छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्‍व रंजन को आमंत्रित किया जाए।"

ठीक बात है, बहस तो दो अलग-अलग विचारों वाले लोगों में ही होती है. लेकिन ऐसा लगता है कि राजेन्द्र जी बहस को भी उसी कोटि में रखते हैं जिस कोटि में साहित्य को "काव्य शास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धी मताम" वाले लोग रखते थे. यानी उमस से बेहाल मौसम में कुछ चपकलश हो जाये. वरना ये विश्वरन्जन कहां के सिद्धान्तकार ठहरे ? वे सरकार के पुलिसिआ तन्त्र का एक पुर्ज़ा हैं, जिन्हें पूरी मुस्तैदी से अपना फ़र्ज़ निभाना है, कोई सिद्धान्त नहीं बघारना. अलबत्ता बहस सही मानी में बहस तब होती जब मौजूदा सरकार के नीति-निर्धारकों या उनके प्रवक्ताओं-पैरोकारों में से किसी को राजेन्द्र जी बुलाते. पर उनका इरादा तो सनसनी पैदा करना था, मौजूदा रक्तपात में किसी सक्रिय हस्तक्षेप की सम्भावनाएं तलाश करना नहीं. क्या राजेन्द्र जी का ख़याल था कि हंस की गोष्ठी के बाद विश्वरंजन शस्त्र समर्पण करके रक्तपात से उपराम हो जाते ? या अरुन्धती यह मान लेती कि छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में लड़ रहे लोगों का रास्ता ग़लत है ? इस तरह की अपेक्षाओं के साथ जिन बहसों की योजना बनती है वह बौद्धिक विलास नहीं है तो और क्या है ?
रही बात शास्त्रार्थ की पुरानी परम्परा की दुहाई देने की, तो राजेन्द्र जी यह कैसे भूल गये कि शास्त्रार्थ शास्त्रियों में होता है. हमारी नज़र में तो ऐसा कोई शस्त्रार्थ नहीं आया जिसमें एक ओर शास्त्री हो, दूसरी ओर बधिक, ख़्वाह वह कविता ही क्यों न लिखता हो. हां, एक उदाहरण ज़रूर है जब शास्त्री पराजित होने के कगार पर पहुंच कर बधिक बनने पर उतारू हो गया था और जिस शास्त्रार्थ ने शास्त्रार्थ नामक इस सत्ता विमर्श की सारी पोल पट्टी खोल कर रख दी थी. पाठक गण याग्यवल्क्य-गार्गी सम्वाद को याद करें जिस में गार्गी द्वारा अपने सारे तर्कों के खण्डन के बाद याग्यवल्क्य ने गार्गी को सीधे-सीधे धमकी दी थी कि इस से आगे प्रश्न करने पर तुम्हारा सिर टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा. तो यह तो है शास्त्रार्थ की वो पुरानी परम्परा.
अब राजेन्द्र जी का झूठ ! क्षमा कीजिये इसे और कोई नाम देना सम्भव नहीं है. राजेन्द्र जी कहते हैं और मैं उन्हीं को उद्धृत कर रहा हूं -- "हंस का दफ्तर सब तरह की बहसों, नाराजगियों, शिकायतों या अन्‍य भड़ासों का खुला मंच है। वक्‍ताओं के नाम पर विचार ही हो रहा था कि यार लोग ले उड़े और पंकज विष्‍ट ने अपने समयांतर में लगभग धिक्‍कारते हुए कि हम बस्‍तर क्षेत्र के हत्‍यारे पुलिस डीजी और अरुंधती को एक ही मंच पर लाने की हिमाकत करने जा रहे हैं।"
झूठ इस में यह है कि नामों पर विचार ही नहीं हो रहा था, बल्कि वे फ़ाइनल हो चुके थे. अगर ऐसा न होता तो पंकज बिष्ट अपने समयान्तर में ऐसा लेख क्यों लिखते भला. यही नहीं, जब मैं ने राजेन्द्र जी से पूछा था कि यह आप क्या कर रहे हैं तो उन्हों ने एक बार भी यह नहीं कहा कि अभी कुछ भी अन्तिम रूप से तय नहीं हुआ है. बल्कि वे तो सारा समय मुझसे वैसी ही कजबहसी करते रहे जैसी उन्हों ने अपने सम्पाद्कीय में की है. लेकिन इसका मलाल क्या. यह उनका पुराना वतीरा है. यह तो अरुन्धती ने भंड़ेर कर दिया और राजेन्द्र जी - मुहावरे की ज़बान में कहें तो - डिफ़ेन्सिव में चले गये वरना वे भी नामवर जी, खगेन्द्र ठाकुर, आलोकधन्वा और अरुण कमल की तरह विश्वरंजन की बग़ल में सुशोभित हो कर धन्य-धन्य हो रहे होते और बहस का पुण्य लाभ कर रहे होते. सो वे यह न कहें कि अभी नामों पर विचार ही हो रहा था.
राजेन्द्र जी ने मुझसे सीधे सवाल पूछा है कि क्या मैं उनका पक्ष नहीं जानता. वे लिखते हैं - "दिल्‍ली में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने को आतुर नीलाभ ने भी "वंदना के इन सुरों में एक सुरा मेरा मिला लो" के भाव से एक लेख पेल डाला। इसमें उन्‍होंने पूछा कि मैं किधर हूं, यह मैंने कभी साफ नहीं किया। जो कुछ पढ़ते-सुनते न हों, उन्‍हें क्‍या जवाब दिया जाए? चाहे तो वे इस बार जुलाई 2010 के संपादकीय पर नजर डाल लें।"
हंस का जुलाई अंक मैं ने अभी नहीं देखा, वह तो इस विवाद के बाद आया है लिहाज़ा सम्भव है राजेन्द्र जी ने कुछ डैमेज कण्ट्रोल एक्सरसाइज़ की हो या हो सकता है हम सिरफिरों की बातों का कुछ असर हुआ हो चाहे वे हमें गालियां ही दें . लेकिन मैं राजेन्द्र जी का पक्ष बख़ूबी जानता हूं. इसीलिए यह भी जानता हूं कि माओवादियों की ओर से शान्ति प्रक्रिया को संचालित करने वाले कौमरेड आज़ाद और तीस वर्षीय युवा पत्रकार हेम चन्द्र पाण्देय की जो निर्मम हत्या फ़र्ज़ी मुठ्भेड़ में पुलिस ने की है उस पर पिछ्ले एक महीने के दौरान जो बैठकें हुई हैं उनमें राजेन्द्र जी क्यों नज़र नहीं आये. हम उनसे यह नहीं कहते कि वे बहस न करें, ज़रूर करें पर अगर वह बहस हमें सम्वेदनहीन कर रही हो या ज़रूरी कामों से भटका रही हो तब हमें ऐसी बहस पर लानत भेजने का साहस होना चाहिए भले ही ऐसा करने पर हंस सम्पादक हमें फ़ासिस्ट ही क्यों न कहें. हम अच्छी तरह जानते हैं कि वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति वाले विमर्श में राजेन्द्र जी का पक्ष क्या है.
चलते चलाते एक बात और. राजेन्द्र जी ने ब्लौग वालों को गालियां देते हुए इस बात पर चुप्पी साध ली है कि ख़ुद उन्होंने इस विवाद को बढ़ाने में एक नहीं दो ब्लौगों की मदद ली है. पर क्या करें जब पाठकों ने इन ब्लौग वालों को ही राजेन्द्र जी का दलाल कहना शुरू कर दिया.
अन्त में यह कि हंस की परम्परा का ज़िक्र करते हुए राजेन्द्र जी उसके संस्थापक प्रेमचन्द का उल्लेख ज़रूर करते हैं. अगर प्रेमचन्द ऐसेरे गोष्ठी करते तो क्या वे एक ओर क्रान्तिकारियों के समर्थक गणेश शंकर विद्यार्थी और दूसरी ओर जनरल डायर को बुलाते ?

Sunday, July 25, 2010

बोलना हो तो तुम्हारे हाथ की दो चोट बोले

प्रिय अजय और अन्य साथियो,
जनज्वार पर कई दिनों से राहुल फ़ाउण्डेशन, परिकल्पना प्रकाशन और सी एल आई की एक शाख से जुड़े शशि प्रकाश, कात्यायनी, सत्यम और उनके कुछ और साथियों के ख़िलाफ़ उनके ही अनेक पुराने साथियों के आरोप पढ़ता आ रहा हुं. किसी हद तक हतप्रभ हुं और किसी क़दर उदास भी. कारण पहला यह है कि मैं सांगठनिक तौर पर तो नहीं लेकिन लिखाड़ियों के नाते से शशि प्रकाश, कात्यायनी, सत्यम को जानता रहा हुं. शशि प्रकाश को बहुत दूर से, लेकिन बाक़ी दोनों को नज़दीक से.परिकल्पना प्रकाशन से मेरा ताज़ा कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ है. मैं उनकी राजनीति क कभी समर्थक नहीं रहा और राहुल फ़ाउण्डेशन को ले कर भी मेरे मन म्रं सवाल रहे हैं. कारण यह कि न्यास वग़ैरा बनाना रजनैतिक दलों का काम नहीं होता और पुस्तकों का प्रकाशन भी राजनैतिक काम काज को बढ़ाने का साधन होता है, जब वह साध्य बन जाये या राजनैतिक काम काज की तुलना में प्राथमिकता ग्रहण कर ले तो समझ लेना चाहिए कि दल अब क़दम ताल ही कर रहा है. लेकिन चूंकि मैं सी एल आई से नहीं जुड़ा था, इसलिये यह मेरा सिर दर्द नहीं था.
मैं १९७० से ही भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी मा.ले. (लिबरेशन) से जुड़ा था -- बतौर सदस्य नहीं, पर उससे कम भी नहीं. अपने दिवंगत साथी गोरख पांडेय की तरह पार्टी का सदस्य न होते हुए भी मैं लगभग सात साल तक पार्टी के सांस्कृतिक संगठन जन संस्कृति मंच का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहा और पार्टी और जसम के साथ अनेक सैद्धांतिक और व्यवहार सम्बन्धी अनसुलझे मतभेदों के चलते मैं अन्ततः जसम से और पार्टी की गतिविधियों से अलग हो गया. पर इसका ज़िक्र आगे या फिर कभी.
इस समय मैं यह कहना चाहता हुं कि इस सारे मुद्दे को सिर्फ़ एक ही संगठन की आलोचनात्मक चीड़-फाड़ के सहारे समझ्ने-समझाने की मुहिम अन्त में व्यक्ति केन्द्रित हो कर असली विषय से भटक जायेगी और यह विषय है वामपन्थी राजनैतिक दलों में भटकाव की समस्या -- उसके कारण और उपचार. ज़ाहिर है सी एल आई का यह भटकाव बहुत पुराना है और पार्टी तथा उसके तहत काम करने वाले संगठनों को टूटने, बंटने, विपथगामी होने की ओर ले गया है. जब विचारधारा में खोट होती है तो वह राजनैतिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी प्रकट होती है. उस दल और संगठन से जुड़े व्यक्तियों का व्यवहार भी पूर्वाग्रहों, नफ़रतों, अमानवीयता और अतार्किकता का शिकार हो जाता है. दल में कौकस बन जाते हैं, सम्विधानेतर शक्ति केन्द्र विकसित हो जाते हैं (यह परिघटना सिर्फ़ कांग्रेस तक सीमित नहीं है, वामपन्थी दल भी इस संक्रमण से अछूते नहीं रह पाये हैं).
पुराने मार्क्सवादी सिद्धांत में दो लाइनों के संघर्ष का बड़ा महत्व रहा है. जब-जब इस सिद्धांत को ताक पर रख कर काम किया गया है, विकृतियां पैदा हुई हैं. इन विकृतियों की क़िस्म अलग-अलग हो सकती है -- सी एल आई में एक क़िस्म की तो माले में दूसरे क़िस्म की -- लेकिन इनका उत्स विचारधारात्मक भटकाव में ही है और इस भटकाव का सबसे पहला लक्षण पार्टियों और उनके संगठनों के सांस्कृतिक व्यवहार में लक्षित होता है. अनेक वामपन्थी राजनैतिक दलों के सांस्कृतिक संगठन तो दूर रहे, उनकी कोई स्पष्ट सांस्कृतिक नीति भी नहीं है. जिन वामपन्थी दलों के सांस्कृतिक संगठन हैं भी, ज़रा उनका मुलाहिज़ा फ़र्माइए. क्या उनमें आज के राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संकट का सामना करने का माद्दा है ? मत भूलिए कि राजनीति का एक अंश नीति भी है जिस से नैतिक शब्द बना है. नैतिकता के बिना न राजनीति सफल होगी, न नीति और न ही सांस्कृतिक पहलक़दमी.
अगर सचमुच साथी लोग कात्यायनी, शशिप्रकाश और सी एल आई से इतने ही नालां थे और हैं तो उन पर और भी दायित्व बनता है कि इस मुद्दे तो सिर्फ़ कुछ व्यक्तियों तक सीमित न करके व्यापक बनायें. इसका यह मतलब नहीं है कि अगर शशिप्रकाश और उनके साथी दोषी हैं तो उनासे जवाब न मांगा जाये या उन्हें कटघरे में न खड़ा किया जाये. लेकिन अन्त में सही विचारधारा, सही काम काज और सही राजनैतिक-सांस्कृतिक दिशा और पहलक़दमी ही आपका जवाब होना चाहिए. कम्यूनिस्ट जब पतित होता है तो वह उतना ही पतित होता है जितना कोई और पर चूंकि वह सबसे ज़्यादा नैतिकता का राग अलापता है इसलिये हमें आघात पहुंचता है. क्या कम्यूनिस्टों के पतन की भर्त्सना करते हुए हम औरों के पतन का औचित्य ठहरा सकते हैं ? हम बच्चन जी को तो हम भुला चुके हैं पर उनकी दो पंक्तियां मुझे अच्छी लगती हैं -- बोलना हो तो
तुम्हारे हाथ की दो चोट बोले

फ़िलहाल इतना ही लिख रहा हुं. आगे फिर......

नीलाभ

बोलना हो तो तुम्हारे हाथ की दो चोट बोले

प्रिय अजय और अन्य साथियो,
जनज्वार पर कई दिनों से राहुल फ़ाउण्डेशन, परिकल्पना प्रकाशन और सी एल आई की एक शाख से जुड़े शशि प्रकाश, कात्यायनी, सत्यम और उनके कुछ और साथियों के ख़िलाफ़ उनके ही अनेक पुराने साथियों के आरोप पढ़ता आ रहा हुं. किसी हद तक हतप्रभ हुं और किसी क़दर उदास भी. कारण पहला यह है कि मैं सांगठनिक तौर पर तो नहीं लेकिन लिखाड़ियों के नाते से शशि प्रकाश, कात्यायनी, सत्यम को जानता रहा हुं. शशि प्रकाश को बहुत दूर से, लेकिन बाक़ी दोनों को नज़दीक से.परिकल्पना प्रकाशन से मेरा ताज़ा कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ है. मैं उनकी राजनीति क कभी समर्थक नहीं रहा और राहुल फ़ाउण्डेशन को ले कर भी मेरे मन म्रं सवाल रहे हैं. कारण यह कि न्यास वग़ैरा बनाना रजनैतिक दलों का काम नहीं होता और पुस्तकों का प्रकाशन भी राजनैतिक काम काज को बढ़ाने का साधन होता है, जब वह साध्य बन जाये या राजनैतिक काम काज की तुलना में प्राथमिकता ग्रहण कर ले तो समझ लेना चाहिए कि दल अब क़दम ताल ही कर रहा है. लेकिन चूंकि मैं सी एल आई से नहीं जुड़ा था, इसलिये यह मेरा सिर दर्द नहीं था.
मैं १९७० से ही भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी मा.ले. (लिबरेशन) से जुड़ा था -- बतौर सदस्य नहीं, पर उससे कम भी नहीं. अपने दिवंगत साथी गोरख पांडेय की तरह पार्टी का सदस्य न होते हुए भी मैं लगभग सात साल तक पार्टी के सांस्कृतिक संगठन जन संस्कृति मंच का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहा और पार्टी और जसम के साथ अनेक सैद्धांतिक और व्यवहार सम्बन्धी अनसुलझे मतभेदों के चलते मैं अन्ततः जसम से और पार्टी की गतिविधियों से अलग हो गया. पर इसका ज़िक्र आगे या फिर कभी.
इस समय मैं यह कहना चाहता हुं कि इस सारे मुद्दे को सिर्फ़ एक ही संगठन की आलोचनात्मक चीड़-फाड़ के सहारे समझ्ने-समझाने की मुहिम अन्त में व्यक्ति केन्द्रित हो कर असली विषय से भटक जायेगी और यह विषय है वामपन्थी राजनैतिक दलों में भटकाव की समस्या -- उसके कारण और उपचार. ज़ाहिर है सी एल आई का यह भटकाव बहुत पुराना है और पार्टी तथा उसके तहत काम करने वाले संगठनों को टूटने, बंटने, विपथगामी होने की ओर ले गया है. जब विचारधारा में खोट होती है तो वह राजनैतिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी प्रकट होती है. उस दल और संगठन से जुड़े व्यक्तियों का व्यवहार भी पूर्वाग्रहों, नफ़रतों, अमानवीयता और अतार्किकता का शिकार हो जाता है. दल में कौकस बन जाते हैं, सम्विधानेतर शक्ति केन्द्र विकसित हो जाते हैं (यह परिघटना सिर्फ़ कांग्रेस तक सीमित नहीं है, वामपन्थी दल भी इस संक्रमण से अछूते नहीं रह पाये हैं).
पुराने मार्क्सवादी सिद्धांत में दो लाइनों के संघर्ष का बड़ा महत्व रहा है. जब-जब इस सिद्धांत को ताक पर रख कर काम किया गया है, विकृतियां पैदा हुई हैं. इन विकृतियों की क़िस्म अलग-अलग हो सकती है -- सी एल आई में एक क़िस्म की तो माले में दूसरे क़िस्म की -- लेकिन इनका उत्स विचारधारात्मक भटकाव में ही है और इस भटकाव का सबसे पहला लक्षण पार्टियों और उनके संगठनों के सांस्कृतिक व्यवहार में लक्षित होता है. अनेक वामपन्थी राजनैतिक दलों के सांस्कृतिक संगठन तो दूर रहे, उनकी कोई स्पष्ट सांस्कृतिक नीति भी नहीं है. जिन वामपन्थी दलों के सांस्कृतिक संगठन हैं भी, ज़रा उनका मुलाहिज़ा फ़र्माइए. क्या उनमें आज के राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संकट का सामना करने का माद्दा है ? मत भूलिए कि राजनीति का एक अंश नीति भी है जिस से नैतिक शब्द बना है. नैतिकता के बिना न राजनीति सफल होगी, न नीति और न ही सांस्कृतिक पहलक़दमी.
अगर सचमुच साथी लोग कात्यायनी, शशिप्रकाश और सी एल आई से इतने ही नालां थे और हैं तो उन पर और भी दायित्व बनता है कि इस मुद्दे तो सिर्फ़ कुछ व्यक्तियों तक सीमित न करके व्यापक बनायें. इसका यह मतलब नहीं है कि अगर शशिप्रकाश और उनके साथी दोषी हैं तो उनासे जवाब न मांगा जाये या उन्हें कटघरे में न खड़ा किया जाये. लेकिन अन्त में सही विचारधारा, सही काम काज और सही राजनैतिक-सांस्कृतिक दिशा और पहलक़दमी ही आपका जवाब होना चाहिए. कम्यूनिस्ट जब पतित होता है तो वह उतना ही पतित होता है जितना कोई और पर चूंकि वह सब्स ज़्यादा नैतिकता का राग अलापता है इसलिये हमें आघात पहुंचता है. क्या कम्यूनिस्टों के पतन की भर्त्सना करते हुए हम औरों के पतन का औचित्य ठहरा सकते हैं ? हम बच्चन जी को तो हम भुला चुके हैं पर उनकी दो पंक्तियां मुझे अच्छी लगती हैं -- बोलना हो तो
तुम्हारे हाथ की दो चोट बोले

फ़िलहाल इतना ही लिख रहा हुं. आगे फिर......

नीलाभ

Thursday, July 15, 2010

डायर से बात करने की वकालत

डायर से बात करने की वकालत
आज अविनाश ने अपने मोहल्ला ब्लोग पर हंस की ओर से जवाब देने क ज़िम्मा उठाया है और वही तर्क दिया है जिसके बारे में मैंने अपनी टिप्पणी में शंका प्रकट की थी. जिस तरह के कार्यक्रम की झांकी अविनश ने अपनी टिप्पणी में दी है वह हम सब जानते हैं कि कपोल कल्पना के सिवा और कुछ नहीं है.
हंस के सम्पादक राजेंद्र यादव ने भले ही गोष्ठी का शीर्षक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाटक वैदिक हिंसा हिंसा न भवति के शीर्षक से ले कर दिया हो और भले ही उनकी मंशा सत्ता की हिंसा पर बहस चलाने की हो लेकिन इस बहस के लिये सत्ता पक्ष की ओर से क्या विश्वरंजन ही रह गये थे जो न तो नीति निर्धारकों मॆं हैं न मौजूदा सरकार के प्रवक्ताओं में. वे सत्ता के एक ऐसे अधिकारी हैं जिनका काम सत्ता के फ़ैसलों को लागू करना है और उन्हें सही साबित करना है जो वे अख़बारों के माध्यम से कर रहे हैं. लेकिन चूंकि मीडिया अब अपनी विश्वसनीयता खो चुका है इसलिये हंस जैसी पत्रिका ज़्यादा कारगर साबित हो सकती है, इसलिये बहस चलाने की तो कोई सम्भावना ही नहीं थी. यह भ्रम पैदा करने की कोशिश की गयी थी कि हंस की गोष्ठी के माध्यम से एक संवाद की भूमि तैयार करने की कोशिश की जा रही है,
अरुन्धती के साथ तीन चार माओवाद समर्थकों को मंच पर लाने और विश्वरंजन को घेरने और नारे लगाती भीड़ द्वारा उनका पर्दा फ़ाश करने का जो सिनैरियो अविनाश ने तैयार किया है वह हमारी फ़िल्मों जैसा है और सच्चाई आम तौर पर इससे बहुत अलग होती है.
रहा सवाल राजेंद्र जी की उदास मुख मुद्रा का जिसका उल्लेख अविनाश ने किया है और उनका हवाला देते हुए उनका स्पष्टीकरण पेश किया है तो क्या वे बतायेंगे कि यही सब राजेंद्र जी ने मुझसे क्यों नहीं कहा था. उन से जो बात हुई थी उससे यह साफ़ था कि सब तै हो चुका है. बल्कि वे मुतमईन थे कि सब फ़ाइनल है. दूसरी बात मेरी टिप्पणी से पहले जनज्वार और हाशिया पर दो टिप्पणियां आ चुकी थीं -- अजय प्रकाश और विश्वदीपक की. राजेन्द्र जी का स्पष्टीकरण आने में इतनी देर क्यों लगी. क्या इसलिये कि अब तुरुप क पत्ता ही पिट गया.
अभी अभी अविनाश ने किन्हीं समरेंद्र सिंह की टिप्पणी मुझे भेजी है जिसमें मेरी खूब ख़बर ली गयी है. ख़ैर, मुझे जो कहना था मैं ने खुल्लम खुल्ला कहा है, अगर हंस को या राजेंद्र यादव को कटघरे में खड़ा करने से मेरी दुकान चलती है तो समरेंद्र को मेरी तरफ़ से छूट है कि वे मुझे गरिया कर अपनी दुकान जमा लें.
चूंकि हंस के साथ प्रेमचन्द का नाम भी जुड़ा है इसलिये एक प्रश्न उन सब से पूछ्ना चाहता हूं जो संवाद संवाद की गुहार लगाये हुए हैं -- क्या प्रेमचन्द अगर अंग्रेज़ी राज और उसकी हिंसा पर कोई गोष्ठी करते तो क्या वे डायर को मंच पर बुलाते ?

--नीलाभ

Tuesday, July 13, 2010

मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम

मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम

(अजय प्रकाश और विश्वदीपक की टिप्पणियों पर एक प्रतिक्रिया)

प्रिय अजय प्रकाश और विश्वदीपक,
दोस्तो या तो तुम लोग बहुत भोले हो या फिर सब कुछ जानते-बूझते हुए मामले को व्यर्थ ही उलझा रहे हो. हंस ने अगर इस बार की सालाना गोष्ठी में विश्वरंजन और अरुन्धती राय दोनों को एक ही मंच पर लाने की योजना बनायी है तो इसके निहितार्थ साफ़ हैं. पहली बात तो यह है कि इस बार की गोष्ठी को "वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति" जैसा शीर्षक दे कर राजेन्द्र जी यह भ्रम देना चाहते हैं कि वे एक गम्भीर बहस का सरंजाम कर रहे हैं. वे यह भ्रम भी पैदा करना चाहते हैं कि हम एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में रह रहे हैं और इसमें सबको अपनी बात कहने क अधिकार है.
दर असल, सत्ता की तरफ़ झुके लोगों का यह पुराना वतीरा है. ख़ून ख़्रराबा भी क्करते रहो और बहस भी चलाते रहो. अब तक राजेन्द्र जी ने झारखण्ड और छत्तीसगढ़ और उड़ीसा या फिर आन्ध्र और महाराष्ट्र में सरकार द्वारा की जा रही लूट-मार और ख़ून ख़्रराबे और आदिवासियों की हत्या पर कोई स्पष्ट स्टैण्ड नहीं लिया है, लेकिन बड़ी होशियारी से वे अण्डर डौग्ज़ के पक्षधर होने की छवि बनाये हुए हैं. इसके अलावा वे यह भी जानते हैं कि जब सभी कुछ ढह रहा हो, जब सभी लोग नंगे हो रहे हों तो एक चटपटा विवाद उन्हें कम से कम चर्चा में बनाये रखेगा और इतना हंस की दुकानदारी चलाने के लिए काफ़ी है, गम्भीर चर्चा से उन्हें क्या लड्डू मिलेंगे ! अब यही देखिये कि बी जमालो तो भुस में तीली डाल कर काला चश्मा लगाये किनारे जा खड़ी हुई हैं और आप सब चीख़-पुकार मचाये हुए हैं.
उधर, हंस के मंच पर और वह भी अरुन्धती राय के साथ आने पर विश्व रंजन को जो विश्वसनीयता हासिल होगी वह नामवर सिंह, आलोक धन्वा, अरुण कमल और खगेन्द्र ठाकुर जैसे महारथियों से अपनी किताब का विमोचन कराने से कहीं ज़्यादा बैठेगी. साथ ही एक जन विरोधी पुलिस अफ़सर की काली छवि को कुछ ऊजर करने का कम भी करेगी. आख़िर हंस "प्रगतिशील चेतना का वाहक" जो ठहरा.
असली मुश्किल अरुन्धती की है. अगर वह शामिल होती है तो राजेन्द्र जी की चाल कामयाब हो जाती है और विश्व रंजन के भी पौ बारह हो जाते हैं. नहीं शामिल होती तो राजेन्द्र जी, विश्व रंजन और उनके होते-सोते हल्ला करेंगे कि देखिये, कितने खेद की बात है, इन लोगों में तो जवाब देने की भी हिम्मत नहीं, भाग गये, भाग गये, हो, हो, हो, हो !
इसलिए प्यारे भाइयो, इस सारे खेल को समझो. यह पूरा आयोजन कुल मिला कर सत्ताधारी वर्ग के हाथ मज़बूत करने की ही कोशिश है.
अब रहा सवाल हिन्दी साहित्य का -- तो दोस्तो विश्व रंजन के कविता संग्रह के विमोचन में जो चेहरे दिख रहे हैं, उनसे हिन्दी साहित्य के गटर की, उसकी ग़लाज़त की, सड़ांध की सारी असलियत खुल कर सामने आ जाती है. वैसे इसकी शुरुआत मौजूदा दौर में करने का सेहरा भी आदरणीय राजेन्द्र जी के सिर बंधा था जब उन्होंने बथानी टोला हत्याकाण्ड के बाद बिहार के सारे लेखकों की बिनती ठुकरा कर लालू प्रसाद यादव से एक लाख का पुरस्कार ले लिया था. उनका पक्ष बिलकुल साफ़ है. यही वजह है कि वे किसी ऐसे स्थान पर नहीं नज़र आते जहां सत्ता के साथ उनका छत्तीस का आंकड़ा बनने की आशंका हो. वे किसी पत्रकार के बेटे की शादी की दावत में आई आई सी में " खाने-पीने" का न्योता नहीं ठुकराएंगे, लेकिन फ़र्ज़ी मुठ्भेड़ में जिसे कहते हैं "इन कोल्ड ब्लड" मार दिये गये युवा पत्रकार हेम चन्द्र पाण्डे की अन्त्येष्टि में शामिल होने का ख़तरा कभी नहीं मोल लेंगे. कहां जाना है कहां नहीं जाना इसे ये सभी लोग अच्छी तरह जानते हैं जिन्हें आप हिन्दी के पुरोधा और सामाजिक परिवर्तन के सूत्रधार बनाये हुए, कातर भाव से उनके कर्तव्यों की याद दिला रहे हैं.
इनमें से कौन नहीं जानता कि बड़े पूंजीपति घरानों के इशारे पर हमारी मौजूदा सरकार झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आन्ध्र और महाराष्ट्र में कैसा ख़ूनी और बेशर्म खेल खेल रही है. लेकिन ये अपने अपने सुरक्षा के घेरे में सुकून से "साहित्य चर्या" में लीन हैं, इसी ख़ूनी सरकार के लोहे के पंजे के कविता संग्रह के क़सीदे पढ़ रहे हैं. क्या इन्हें माफ़ किया जा सकता है ? मत भूलिए कि जो समाज की बड़ी बड़ी बातें करते हैं उनका उतना ही पतन होता है. यह हमारे ही वक़्त की बदनसीबी है कि "गोली दागो पोस्टर" का रचनाकार उसी दारोग़ा के साथ है जिसके उत्पीड़न पर उसने सवाल उठाया था. ये वही अरुण कमल हैं जिन्हों ने लिखा था : " जिनके मुंह मॆं कौर मांस का उनको मगही पान". बाक़ियों की तो बात ही छोड़िए.
तो भी, मैं तुम दोनों को इस बात पर ज़रूर बधाई देना चाहता हूं कि इस चौतरफ़ा ख़ामोशी और गिरावट के माहौल में तुम दोनों ने इस ज़रूरी मुद्दे को उठाया है हालांकि चोट हलकी है साथियो, बहरों को सुनाने के लिए ज़ोरदार धमाका चाहिये.
अन्त में अपने एक प्रिय कवि का कवितांश जिसे हम अब धीरे-धीरे भूल रहे हैं :

ओ मेरे आदर्शवादी मन,
ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन,
अब तक क्या किया ?
जीवन क्या जिया !!

उदरम्भरि बन अनात्म बन गये,
भूतों की शादी में कनात से तन गये,
किसी व्यभिचारी के बन गये बिस्तर,

दु:खों के दाग़ों को तमग़े सा पहना,
अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना,
असंग बुद्धि व अकेले में सहना,
ज़िन्दगी निष्क्रिय बन गयी तलघर,

अब तक क्य किया,
जीवन क्या जिया!!

................

भावना के कर्तव्य त्याग दिये,
हॄदय के मन्तव्य मर डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ ही उखाड़ दिये,
जम गये, जाम हुए फंस गये,
अपने ही कीचड़ में धंस गये !!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में,
आदर्श खा गये.

अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया !!
बहुत-बहुत ज़्यादा लिया,दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम !

--नीलाभ

Thursday, March 4, 2010

रहिए अब ऐसी जगह....

रहिए अब ऐसी जगह....

होली का दिन है और मस्ती ग़ायब है. अभी-अभी एक ब्लौग देख रहा था कि कुछ पुरानी कविता पंक्तियां याद हो आयीं :
क्या यह महज़ इत्तफ़ाक़ है कि मैं
कश्मीर में मुसलमान नहीं हुआ
औरंगाबाद में हरिजन नहीं हुआ,
जहानाबाद में भूमिहीन किसान नहीं हुआ
पंजाब में मोन्ना नहीं हुआ ?

क्या इसी इत्तफ़ाक़ के बल पर बचा हुआ हूं अब तक
बीसवीं सदी के आख़िरी हिस्से में
उमड़ती हुई ख़ून की बाढ़ में
जबकि हत्यारों के इरादे बहुत साफ़ हैं
और कोई भी जगह निरापद नहीं है

क्या यह भी इत्तफ़ाक़ का तक़ाज़ा कहा जायेगा
कि मैं मरूंगा उसी गोली से
जिस पर मेरा नाम होगा

हो सकता है इत्तफ़ाक़न
उनकी हिट लिस्ट में मेरा भी नाम हो
शहर के माफ़िआ सरग़ना से ले कर
संस्कृति के माफ़िआ सरग़ना तक

क्या इसी इत्तफ़ाक़ के बल पर बचे हुए हैं
दिल्ली और भोपाल घरानों के कवि
मारे जाते हैं पाश और सफ़दर
आत्म-हत्या की तरफ़ ध्केला जाता है गोरख पाण्डेय

कौन है नादिर शाह ? समय या संयोग?
ख़ून से भीगा पुचाड़ा फेरता हुआ समूचे देश पर

कोई उत्तर नहीं आता और यह इत्तफ़ाक़ नहीं है

ये पंक्तियां यों याद हो आयीं कि इलाहाबाद और लखनऊ से निकलने वाले अख़बार डेली न्यूज़ ऎक्टिविस्ट से जुड़े पत्रकार आवेश तिवारी ने इस बात को ले कर काफ़ी दुख भरा विषवमन किया है कि बीसवीं सदी के महानतम चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन को क़तर की नागरिकता पेश की गयी और उन्होंने स्वीकार कर ली. आवेश का कहना है कि यह हुसैन का भगोड़ापन है, कायरता है और इसके लिए उनकी जितनी भर्त्सना की जाये, उतनी कम है. अपने पक्ष मॆं आवेश ने भाजपा और कारपोरेट जगत के हाथ बिके हुए पत्रकार चन्दन मित्रा का हवाला दिया है. हवाला दिया है कि चन्दन मित्रा ने कहा था कि ‘जब तक हिंदुस्तान में न्याय जीवित रहेगा, तब तक हम हुसैन की विवादास्पद पेंटिंग का विरोध करने वालों और उनके खिलाफ न्यायालय की अनवरत और जानबूझ कर की जा रही अवमानना को ले कर की गयी कार्यवाहियों को भी गलत नहीं ठहरा सकते हैं।’ ज़रा इस हवाले का मतलब समझने की कोशिश तो करें. आप पायेंगे कि कुल मिला कर चन्दन मित्रा उसी भाजपाई और संघी एजेण्डा के पैरोकार हैं जो एक तरफ़ हमारे प्राचीन ग्रन्थों और पुरा कथाओं की बात करता है मगर नहीं जानता कि वे कितने खुले और जीवन्त थे. वह उन्हें अपनी संकीर्ण हिन्दू मध्यवर्गीय मानसिकता में फ़िट करना चाहता है. वह नहीं जानता कि जिन देवी-देवताओं की तोता रटन्त वह दिन रात करता रहता है वे ख़ुद को हिन्दू नहीं कहते थे. आर्य कहते रहे हों, देव कहते रहे हों या और कुछ भी कहते रहे हों. यही नहीं, आचार, विचार, कला, कर्म और मान्यताओं को ले कर भी उनमें ज़्यादा उदारता और खुलापन था. विश्वास न हो तो देवी दुर्गा के प्रकट होने के वर्णन को देखिये या फिर अन्य देवी देवताओं के कार्य कलाप. यह खुलापन एक लम्बे अर्से तक बना रहा. उसने बड़ी कला को जन्म दिया-- खजुराहो और दूसरे मध्यकालीन मन्दिर, अजन्ता एलोरा की गुफाएं और उनके भित्तिचित्र, कलिदास, भास, बाणभट्ट, शूद्रक और विशाखदत्त जैसे रचनाकारों की कृतियां, गिनाते चले जाइए. ऐसे में जब भर्तृहरि के शब्दों में पुच्छ-विषाणहीन पशु कला और कलाकारों के भाग्यविधाता बनने की जुर्रत करने लगें तो ऐसे माहौल से दूर हो जाना ही बेहतर है. कितनी दिलचस्प बात है कि सचिन तेन्डुलकर के लिए भारत रत्न की मांग करने वालों ने कभी किसी सहित्यकार के लिए भारत रत्न की फ़र्माइश नहीं की. तब अगर मक़बूल फ़िदा हुसैन ने आत्म-निर्वासन का रास्ता चुना तो ऐसा क्या ग़ज़ब किया? मज़ा तो तब था जब उन पर बाला साहब से ले कर संघ परिवार का अदना-से-अदना आदमी हमला कर रहा था तब हम जो अब घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं धरने पर बैठ जाते कि हम यह बेहूदगी बर्दाश्त नहीं करेंगे. इसलिए आवेश तिवारी से यही अनुरोध है कि तिवारी जी, फ़ालतू में सिद्धान्त बघारने का कोई लाभ नहीं है. हिम्मत है तो देश में ऐसे हालात पैदा कीजिये कि आवाज़ आज़ाद रह सके.

Saturday, February 20, 2010

सलाख़ों के पीछे क़ैद स्वाधीनता
इरादा तो आज था कि अभय ने अपने ब्लौग-- निर्मल आनन्द-- में जो सवाल उठाया है : हिन्दी में सितारा कौन है ? -- उस पर कुछ विचार किया जाये, लेकिन आज एक ऐसी बात हुई कि आप से किसी और विषय की चर्चा करने को मन हो आया है.
आज हमारी युवा मित्र सीमा आज़ाद और उनके पति विश्वविजय की १४ दिन की रिमाण्ड की अवधि पूरी हो रही थी और उन्हें पुलिस फिर से रिमाण्ड में लेने के लिये अदालत में पेश करने नैनी जैल से लाने वाली थी. बात को आगे बढ़ाने से पहले मैं आपको यह बता दूं कि सीमा आज़ाद मानवाधिकार संस्था पी.यू.सी.एल. से सम्बद्ध हैं, साथ ही द्वैमासिक पत्रिका "दस्तक" की सम्पादक हैं और उनके पति विश्वविजय वामपन्थी रुझान वाले सामाजिक कार्यकर्ता हैं. अपनी पत्रिका "दस्तक" में सीमा लगातार मौजूदा जनविरोधी सरकार की मुखर आलोचना करती रही है. सीमा ने पत्रिका का सम्पादन करने के साथ-साथ सरकार के बहुत-से क़दमों का कच्चा-चिट्ठा खोलने वाली पुस्तिकाएं भी प्रकाशित की हैं. इनमें गंगा एक्सप्रेस-वे, कानपुर के कपड़ा उद्योग और नौगढ़ में पुलिसिया दमन से सम्बन्धित पुस्तिकाएं बहुत चर्चित रही हैं. हाल ही में, १९ जनवरी को सीमा ने गृह मन्त्री पी चिदम्बरम के कुख्यात "औपरेशन ग्रीनहण्ट" के खिलाफ़ लेखों का एक संग्रह प्रकाशित किया. ज़ाहिर है, इन सारी वजहों से सरकार की नज़र सीमा पर थी और ६ तारीख़ को पुलिस ने सीमा और विश्वविजय को गिरफ़्तार कर लिया और जैसा कि दसियों मामलों में देखा गया है उनसे झूठी बरामदगियां दिखा कर उन पर राजद्रोह का अभियोग लगा दिया.
वैसे यह कोई नयी बात नहीं है. जनविरोधी सरकारें सदा से यही करती आयी हैं. हाल के दिनों में मौजूदा सत्ताधारी कौंग्रेस ने जिस तरह देश को बड़े पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों गिरवी रखने के लिये क़रार किये हैं और कलिंगनगर, सिंगुर, नन्दीग्राम, लालगढ़, और बस्तर और झारखण्ड के आदिवासियों को बेदखल करना शुरू किया है, वह किसी भी तरह की आलोचना को सहन करने के मूड में नहीं है. और इसीलिये हमारी तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था लोकतंत्र को लम्बा अवकाश दे कर अपनी नीतियों के विरोधियों को कभी "आतंकवादी" और कभी "नक्सलवादी" या "माओवादी" घोषित करके जेल की सलाखों के पीछे ठूंसने का वही फ़र्रुख़ाबादी खेल खेलने लगी है. इस खेल में सब कुछ जायज़ है -- हर तरह का झूठ, हर तरह का फ़रेब और हर तरह का दमन. और इस फ़रेब में सरकार का सबसे बड़ा सहयोगी है हमारा बिका हुआ मीडिया. इसीलिए हैरत नहीं हुई कि सीमा की गिरफ़्तारी के बाद अख़बारों ने हर तरह की अतिरंजित सनसनीख़ेज़ ख़बरें छापीं कि ट्रक भर कर नक्सलवादी साहित्य बरामद हुआ है, कि सीमा माओवादियों की "डेनकीपर" (आश्रयदाता) थी और विश्वविजय माओवादियों के कमाण्डर हैं. यही नहीं, पुलिस और अख़बारों ने मिल कर ऐसा ख़ौफ़ का वातावरण पैदा करने की कोशिश भी की जिस से सीमा के परिवार और मित्रों का मनोबल टूट जाये.
अभय ने अपने ब्लौग मॆं पुस्तक मेले का ज़िक्र किया है. मज़े की बात है कि पांच फ़रवरी को उसी पुस्तक मेले में अभय, मैं और सीमा साथ थे और जिस साहित्य को पुलिस और अख़बार नक्सलवादी बता रहे हैं वे पुस्तक मेले से ख़रीदी गयी किताबें थीं.
बहरहाल, आज की तरफ़ लौटें तो सीमा और विश्वविजय की रिमाण्ड के चौदह दिन आज पूरे हो रहे थे और आज दोनों को अदालत में पेश होना था. हम ग्यारह बजे ही अदालत पहुंच गये. लगभग दो घण्टे के इन्तज़ार के बाद सीमा और विश्वविजय को अदालत में लाया गया. मुझे यह देख कर बहुत खुशी हुई कि दोनों इन चौदह दिनों में थोड़े दुबले भले ही हो गये थे लेकिन दोनों का मनोबल ऊंचा था. सीमा के चेहरे पर एक दृढ़्ता थी और विश्वविजय के चेहरे पर मुस्कान. सीमा हमेशा की तरह मुस्कराती हुई आयी और उसने गर्मजोशी से हाथ मिलाया. लगा जैसे सलाख़ों के पीछे क़ैद स्वाधीनता चली आ रही हो.
हम लोग काफ़ी देर तक सीमा से बातें करते रहे, बिना फ़िकर किये कि सरकार के तमाम गुप्तचर किसी-न-किसी बहाने से आस-पास मंडरा रहे थे और . जब हम आने लगे तो सीमा ने ख़ास तौर पर ज़ोर दे कर कहा कि उसे तो बयान देने की इजाज़त नहीं है, इसलिए वह पुलिस और मीडिया के झूठ का पर्दाफ़ाश नहीं कर पा रही, लेकिन मैं सब को बता दूं कि पुलिस की सारी कहानी फ़र्ज़ी है जैसा कि हम बार-बार देख चुके हैं
सो दोस्तो, यह रिसाला जैसा भी उखड़ा-उखड़ा है सीमा की बात आप सब तक पहुंचाने के लिए भेज रहा हूं. सीमा की रिमाण्ड की अर्ज़ी खारिज हो गयी है. २२ तारीख़ को उसे ज़मानत के लिए पेश किया जायेगा और आशंका यही है कि उसे ज़मानत नहीं दी जायेगी. आशंका इस बात की भी है कि स्पेशल टास्क फ़ोर्स सीमा और विश्वविजय को अपनी रिमाण्ड में ले कर पूछ-ताछ करें और जबरन उनसे बयान दिलवायें कि वे ऐसी कार्रवाइयों में लिप्त हैं जिन्हें राजद्रोह के अन्तर्गत रखा जा सकता है. हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहां सब कुछ सम्भव है-- भरपूर दमन और उत्पीड़न भी और जन-जन की मुक्ति का अभियान भी. यह हम पर मुनस्सर है कि हम किस तरफ़ हैं. ज़ाहिर है कि जो मुक्ति के पक्षधर हैं उन्हें अपनी आवाज़ बुलन्द करनी होगी. अर्सा पहले लिखी अपनी कविता की पंक्तियां याद आ रही हैं :
चुप्पी सबसे बड़ा ख़तरा है ज़िन्दा आदमी के लिए
तुम नहीं जानते वह कब तुम्हारे ख़िलाफ़ खड़ी हो जायेगी और सर्वधिक सुनायी देगी
तुम देखते हो एक ग़लत बात और ख़ामोश रहते हो
वे यही चाहते हैं और इसीलिए चुप्पी की तारीफ़ करते हैं
वे चुप्पी की तारीफ़ करते हैं लेकिन यह सच है
वे आवाज़ से बेतरह डरते हैं
इसीलिए बोलो,
बोलो अपने हृदय की आवाज़ से आकाश की असमर्थ ख़ामोशी को चीरते हुए
बोलो, नसों में बारूद, बारूद में धमाका,
धमाके मॆं राग और राग में रंग भरते हुए अपने सुर्ख़ ख़ून का
भले ही कानों पर पहरे हों, ज़बानों पर ताले हों, भाषाएं बदल दी गयी हों रातों-रात
आवाज़ अगर सचमुच आवाज़ है तो दब नहीं सकती
वह सतत आज़ाद है.